Home Satyasmee Mission पूर्णिमा का व्रत चौदस के दिन या पूर्णिमा के दिन कब करें

पूर्णिमा का व्रत चौदस के दिन या पूर्णिमा के दिन कब करें

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सच में तो पूर्णिमा का अर्थ ही सायंकाल के चन्द्र उदय से प्रातः ब्रह्म महूर्त के समय तक ही पूर्णमासी का व्रत कहलाता है और तभी करना चाहिये चूँकि हमारे ज्योतिष का मुख्यधार चन्द्र और उसकी इकत्तीस कलाएं यानि पन्द्रह कला अमावस की और सौलह कलाएं मिलकर जिनमें मुख्यतया चौदह+चौदह=अट्ठाईस+एक अमावस+एक पूर्णिमा=तीस+एक लय और सृष्टि काल मिलकर इकत्तीस दिवस का वर्षभर चौबीस चन्द्र योग बनता रहता है यो सामाजिक तौर पर सूर्य को स्थिर तत्व आत्मा माना है जिसमें कोई परिवर्तन नही होता है और चन्द्रमा को मन माना है जिसमें दो पक्ष है एक भोग यानि कर्म और एक योग यानि व्यवहार यो ये परिवर्तनशील और गतिशील है जो की इस सम्पूर्ण विश्व प्रकर्ति का नियम है तभी आनन्द है अन्यथा एक सी स्थिति में कोई आनन्द नही होता है यो चन्द्रमा में स्त्री तत्व और पुरुष तत्व दोनों है परन्तु मुख्यतया चन्द्रमा को स्त्री तत्व ग्रह ही माना है यो सनातन धर्म में मनुष्य और मन और उसकी शक्ति यानि माया का अधिपत्य चन्द्रमा को ही प्राप्त है तभी चन्द्रमा की सभी तीस कलाओं को स्त्री यानि दक्ष की पुत्री बनाकर चन्द्र की पत्नी बना दिया जो की बिलकुल गलत है दक्ष का अर्थ है जो किसी भी गुणों में सम्पूर्ण हो यो ये सभी कलाएं दक्ष की पुत्री अर्थ है अतः चन्द्रमा की उपासना रात्रि को ही होती है जो की कालांतर में मुस्लिम धर्म ने अपना ली जबकि ये पहले सनातन धर्म में रात्रि जागरण कहलाती थी सभी साधक रात्रि में अपनी अपनी मनोरूप साधना मंत्रो से जप यज्ञ से एकांत में निर्विघ्नता के साथ करते थे।कालांतर में आलस्य और निंद्रा पूरण ने इस सच्चे रात्रि जागरण के स्थान पर अनावश्यक दिन के व्रतानुष्ठान में परिवर्तित कर दिया जिसका सत्य में कोई विशेष लाभ साधक को नही मिलता है यो सही में चन्द्रमा के अमावस या पूर्णिमा को पंद्रहवे दिन के साय काल को ही अखण्ड दीपक रात्रि भर जलाते हुए रात्रि जागरण करते मंत्र जप करते हुए रात्रि के 11बजे से दो बजे के मध्य के महाक्षण विज्ञानं योग में यज्ञ करते हुए सम्पूर्ण करना चाहिए इसी बीच हमें पञ्चमेवा युक्त खीर का प्रसाद चन्द्रमा की रश्मियों को पड़ने वाले ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जहाँ कोई रात्रि जीव मल मूत्र को आकाश से उड़ते में नही कर सके और ढक कर रखे यही चन्द्र और पूर्णिमा का प्रत्यक्ष भोग लगाना कहते है जिसे पूर्णिमा देवी अपनी सौलह कलाओं के वाहक चन्द्रमा के साथ जीवन्त भोग लगा साधक को प्रसाद रूप में प्रदान करती है जिसे व्रत समाप्ति के उपरांत ब्रह्म महूर्त में ही सूर्य उदय से पूर्व ही खा कर साधक मनवांछित वरदान को प्राप्त करता है।क्योकि सूर्य के उदय होने पर सूर्य की शक्ति का प्रभाव उस चन्द्रमा के शीतल और सोमरस अमृततुल्य ओषधि के गुणों को उग्रता में बदल देता है तब खीर प्रसाद खाने से कोई लाभ नही होता है। जिनके पास पूर्णिमाँ देवी प्रतिमा और श्रीभगपीठ है वे साय व्रत से पूर्व देवि और उनके आप रूपी संतान स्वरूप पुत्र अमोघ और पुत्री हंसी को तथा श्रीभगपीठ के मध्य त्रिकोण में व्याप्त ईं कुंडलिनी बीज मंत्र को जल सिंदूर से टीका करते हुए उन्हें खीर का भोग लगाये और आरती चालीसा करते हुए तब व्रत आरम्भ करें और प्रातः ब्रह्म महूर्त में भी स्नान करने के उपरांत भी देवी,संतान,श्रीभगपीठ को तिलक लगाकर स्वयं के माथे पर तिलक लगाये आरती चालीसा करे और खीर भोग लगा कर अंत में स्वयं व् परिजनों को प्रसाद दे।
तो भक्तो समझ आया होगा की अमावस और पूर्णिमा का व्रत रात्रि को करना चाहिए यो अपनाओ और मनवांछित वरलाभ प्राप्त करो।।
?श्रीमद् देवी पूर्णिमाँ व्रत २०१७?
महावतार पूर्णिमाँ देवी और उनकी बारह महाकला शक्तियों की प्रतिवर्ष की क्रमबद्ध बारह सिद्ध पूर्णिमायें:-
१२-जनवरी(गुरु) पौष पूर्णिमा-की देवी सत्यई और हंसी है।
१०-फरवरी(शुक्र) माघ पूर्णिमा-की देवी तरुणी है।
१२-मार्च(रवि) फाल्गुन पूर्णिमा-की देवी यज्ञई है।
११-अप्रैल(मंगल) चैत्र पूर्णिमा-की देवी अरुणी व् देवी एकली है।और प्रेम पूर्णिमाँ है।
१०-मई (बुध)वैशाख पूर्णिमा-की देवी उरूवा है।
०९-जून (शुक्र) ज्येष्ठ पूर्णिमा-मनीषा है।
०९-जुलाई (रवि) आषाढ़ पूर्णिमा-की देवी सिद्धा व
देवी नवेषी है।
०७-अगस्त (सोम) श्रावण पूर्णिमा-की देवी इतिमा है।
०६-सितम्बर (बुध) भाद्रपद पूर्णिमा-की देवी दानेशी है।
०५-अक्टूबर (गुरु) अश्विन पूर्णिमा-देवी धरणी व देवी मद्यई है।
०४-नवम्बर(शनि)कार्तिक पूर्णिमा-की देवी आज्ञेयी है।
०३-दिसम्बर (रवि) मार्गशीर्ष पूर्णिमा-की देवी यशेषी है।।
-इस प्रकार से इन बारह पूर्णिमाओं के व्रत के समय महावतार सत्यई पूर्णिमाँ की सौलह कलाओं का इस क्रमविधि से ध्यान करते हुए सिद्धासिद्ध महामंत्र “सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा” का जप सामान्य अथवा गुरु दीक्षा विधि से करने से उन्हीं गुणों व छमताओं का सम्पूर्ण विकास और सिद्धि मनुष्य को प्राप्त होकर कल्याण होता है।
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