प्रश्न:-हमे प्रेम के रिश्ते में जो प्रेम चाहिए वो क्यो नही मिलता है और अंत मे उस प्रेम पाने का अंत पीड़ा भरा होकर समाप्त क्यो होता है?? संछिप्त में ज्ञान मार्ग से समझाएं,,
सत्यसाहिब जी का उत्तर:-
हम प्रेम के लास्ट अर्थ वाले यानी क्लाइमेक्स की सोच से परस्पर जुड़ते है यानी प्रर्मिक रूप में पति पत्नी के पूर्ण भाव से एक दूसरे से चरित्रक रूप से समर्पित होकर जुड़ना और आओ अब इस रिश्ते के 5 भाग क्या है,उन्हें गहनता से देखे और जांचे की क्या ये हमारे प्रेमिक जीवन मे कितने ओर कहाँ तक है और टिकाऊ भी है या नहीं,तो इसे यहां लिखे 5 प्रेम के भाग में जांचे ओर विचार करें,,
1:-परस्पर एक दूसरे की नियमित केयरिंग करना।
जो कि नहीं कर सकते है।अभाव ही रहता है।
परिणाम इस भाग से बने रिश्ते के अभाव से मीठा फल नही मिलते है।

2:-एक दूसरे को पसंद का खाना बनाकर खिलना।या बनाकर भेजना।
जो कि नहीं कर पाते है।
परिणाम इस भाग के रिश्ते का मीठा फल भी नहीं मिलता है।

3:-एक दूसरे के साथ कुछ आवश्यक वस्तुओं की खरीदते बाजार या ऐसी जगहां घूमने का आनन्द भरा दायित्वों को अपनाना।
वो भी नहीं कर पाते है।
परिणाम इस भाग के रिश्ते का मीठा फल नही प्राप्त होता है।

4:-इस भाव मे मुख्य दो भाग है-
1-अपनी व्यक्तिगत परिवारिक ओर -2-अपनी व्यक्तिगत सामाजिक समस्याओं का निदान करने में भरपूर सहयोग करना।
वो भी नहीं कर पाते है।पूछ कर केवल राय दे कर छोड़ देते है।

परिणाम इस भाग के रिश्ते से बनकर मिलने वाला मीठा फल नहीं प्राप्त होता है।
5:-ओर जीवन का सबसे नजदीकी अवस्था है,अभेदावस्था।
जिसमे कोई सौदा नहीं हो।

वो है प्रेमायुक्त प्रेम समर्पण।
जो असुरक्षा व देरी पीड़ा रिलेक्स यानी संतोष के बिना के साथ जल्द प्राप्त होता है या प्रोटेक्शन के बनाये रखने के कारण सतही स्तर पर प्राप्त होता है या नहीं होता है।और ऊपर के चार भावों का अभाव होने से इसी पांचवे भाव की प्राप्ति पर टिका होने से सदा लुटे पीटे के भाव से समाप्त होने के खतरे पर रखे होने ओर कुछ और ऐसे ही समय जुड़ा रहकर अंत मे इसी अभाव से खत्म होता है।
यो ये प्रेम रिश्ते कभी भी अपने प्रेम के सम्पूर्णतत्व को प्राप्त नही होते है।जिसको हम लेकर चलते है।समझे,,,।
ओर जिनका ऐसा प्रेमिक विवाह हुआ।उनके लिए कहूंगा कि,यानी जिनके प्रेम रिश्ते विवाह में पूरे होते भी है,तो उनका मूल स्वभाव होता है- उपेक्षा भरी संतुष्टि पर टिका होना।ओर इससे आगे चलकर जो प्रेम की चर्मोउत्कर्ष की कल्पना थी।उस तक कभी नही पहुँचता है,जिसे मैं डिवाइन लव दिव्य प्रेम और उसकी प्रेमसमाधि कहता हूं।
इस विषय ओर फिर कभी सत्संग कहूंगा।
इतने मेरी कहीं बात को गहराई से समझे और सुधार करें तो प्प्रेम प्राप्ति सम्भव है।अन्यथा नहीं।
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी
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