अक्षय तृतीया पर्व ओर *महर्षि परशुराम जयंती पर विशेष लेख, क्या सच में महर्षि परशुराम विष्णु जी के छठे अवतार थे,या महर्षि विश्वामित्र थे छठे विष्णु अवतार,या ये कोई ब्राह्मणवादी षड़यंत्र है,छत्रियों के अवतार होने के घमंड को तोड़ने के लिए?तब असल मे विष्णु के छठे अवतार कौन थे? जाने सच,,,बता रहे है,स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी।

अक्षय तृतीया पर्व ओर *महर्षि परशुराम जयंती पर विशेष लेख,
क्या सच में महर्षि परशुराम विष्णु जी के छठे अवतार थे,या महर्षि विश्वामित्र थे छठे विष्णु अवतार,या ये कोई ब्राह्मणवादी षड़यंत्र है,छत्रियों के अवतार होने के घमंड को तोड़ने के लिए?तब असल मे विष्णु के छठे अवतार कौन थे?
जाने सच,,,बता रहे है,स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी।

आओ पहले ये जान ले कि यहां तीन प्रमुख ज्ञान इस बात की समझ को मुख्य आधार यानी प्रमाण है,,

1-कैसे श्री विष्णु जी क्षत्रिय है,ओर उनके कौन से 24 अवतार है,
विष्णु जी क्षत्रिय कैसे:-विष्णु का अर्थ है,विश्व के अणु अणु में व्याप्त क्रिया शक्ति,यानी जो विश्व को क्रियाशील बनाने और सभी कर्म करने की शक्ति हो,यो विष्णु अर्थ विश्व का पालनकर्ता शक्ति है ओर सनातन धर्म मे ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैओर विष्णु पालनकर्ता है और शिव संहारकर्ता है,इसी से क्षत्रियों को धर्म और कर्म की रक्षा व पालनकर्ता कहा गया है,ओर जो पालनकर्ता होता है,वही राजा होता है,यो विष्णु जी इस विश्व के पालन कर्ता होने से महाराजा है और इन्हीं के अवतार क्षत्रिय अवतार है,चाहे वो वामनावतार में छद्म वेषधारी ब्राह्मण बनकर अवतार लिया,पर वे ब्राह्मण नहीं है,ब्राह्मण ब्रह्मा की सृष्टि है।
यो जब ब्रह्मा की उपासना निषेध होकर बन्द हो गयी,तभी से ये ब्राह्मणवादी अवतारवादी शास्त्रगत घुसपैंठ का प्रारम्भ हुआ।जिसने सारे के सारे शास्त्रों में की गई उलटफेर से अनसुलझी कथाओं का जन्म हो गया,जिनका उत्तर आजतक नहीं मिलता है,यो नए सिर से इन पर शोध की आवश्यकता ओर प्रस्तुति से पुनः सच्ची मान्यतग का आस्तिकवादी मान्यता की बहुत आवश्यकता है।तभी सच्चे वैज्ञानिक ज्ञान का उदय होगा।
श्रीमद्भागवत में अवतारों की मुख्यतः दो सूचियाँ हैं।
पहली सूची:-में 24 अवतारों के नाम इस प्रकार हैं:-

1-सनकादि(बाल्यावतार)
2-पृथु(क्षत्रिय अवतार)
3-वराह(पशु अवतार)
4-यज्ञ (अग्नि सुयज्ञ)
5-कपिल(ब्राह्मण अवतार)
6-दत्तात्रेय(त्रिदेवों का समल्लित अवतार)
7-नर-नारायण(अर्द्ध अवतार)
8-ऋषभदेव(क्षत्रिय अवतार,जैन धर्म संस्थापक)
9-हयग्रीव(घोड़ा पशु अवतार)
10-मत्स्य(पानी के जीव मछली अवतार)
11-कूर्म(पानी के जीव कछुवा अवतार)
12-धन्वन्तरि(वैद्य अवतार)
13-मोहिनी(मूल में पुरुष और छद्म में स्त्री अवतार)
14-गजेन्द्र-(पशु अवतार)
15-नरसिंह(पशु अवतार)
16-वामन(छद्म ब्राह्मण)
17-हंस(ज्ञानी पशु अवतार)
18-परशुराम(आधे क्षत्रिय व आधे ब्राह्मण)
19-राम(क्षत्रिय)
20-वेदव्यास(अर्द्ध ब्राह्मण व अर्द्ध क्षत्रिय अवतार)
21-बलराम(क्षत्रिय)
22-कृष्ण(क्षत्रिय)
23-बुद्ध(क्षत्रिय अवतार)-जबकि बुद्ध ने सभी वेदों को मानने से और ब्राह्मणों को पहले मानने से मना कर दिया और कहा की,सही में,पहले क्षत्रिय,द्धतीय ब्राह्मण,तृतीय वैश्य,चतुर्थ शुद्र है)
24-कल्कि(विवादस्त ओर सम्भावित,ब्राह्मण अवतार)।

2-दूसरी सूची:-

  1. आदि पुरुष।
  2. चार कुमार सनकादिक मुनि।
    3-नारद
    4-नर-नारायण।
    5-कपिल।
    6-दत्तात्रेय।
    7-यज्ञ।
    8-ऋषभदेव।
    9-पृथु।
    10-धन्वंतरि।
    11-मोहनी।
    12-हरग्रीव।
    13-मतयस्यावतार।
    14-महर्षि वेद व्यास।
    15-कूर्म अवतार।
    16-वराह अवतार।
    17-नरसिंह।
    18-वामन।
    19-परशुराम।
    20-श्री हरि।
    21-श्री राम।
    22-श्री कृष्ण।
    23-बुद्ध।
    24-कल्कि।
    विष्णु जी के 10 प्रमुख अवतार हैं:-
    1-मत्स्य अवतार।
    2-कूर्म अवतार।
    3-वराह अवतार।
    4-नरसिंह।
    5-वामन अवतार।
    6-परशुराम।
    7-श्री राम।
    8-श्री कृष्ण।
    9-बुद्ध।
    10-कल्कि।

2-महर्षि परशुराम की पराक्रमी कथाएं,जिनसे इन्हें विष्णु जी का छठा अवतार बनाया गया और इन पराक्रमी कथाओं में बताया गया और छिपाया गया, कितना सत्य है,जो इन्हें सबके सामने स्पष्ट सिद्ध करता है कि,ये अवतारवाद के कहीं से भी लायक नहीं थे,हाँ उप अवतारवाद में रखे जाने चाहिए,,तो आओ जाने,,

1-21 बार पृथ्वी से क्षत्रियों को मार कर क्षत्रिय विहीन कर दी,ओर पृथ्वी को ब्राह्मणों को दान कर दी थी।ओर इसका कारण ये था,की
ऋषि जमदग्नि को राजा हयहैय ने गाएं दान में दी थीं,राजा के बेटे कृतअर्जुन और कृतवीर्यअर्जुन गाएं वापस मांगने लगे।महर्षि जमदग्नि ने जब गाएं लौटाने से मना कर दिया, तो राजाओं ने ताकत के बल पर गाएं छीन लीं। इस प्रकार घमंडी क्षत्रियों के द्धारा अपने पिता की बेइज्जती से परशुराम को क्रोध आ गया और उन्होंने जाकर उन सभी राजाओ का गला काट डाला,फिर उन्हें लगा कि ये क्षत्रिय धरती पर रहने के योग्य ही नहीं हैं, तो इसी घटना से “क्षत्रिय मिटाओ विश्व अभियान’ का प्रारम्भ कर दिया। उनके अनुसार जब तक क्षत्रिय हैं, ये धरती ब्राह्मणों के रहने लायक नहीं है।ओर यहीं से वैदिक शास्त्रों में से क्षत्रिय अवतारों की चली आ रही श्रंखला को भी लेखनी से मिटाने का अभियान शुरू हुआ।

ओर 22 वीं बार क्षत्रिय मिटाओ अभियान कैसे खत्म हुआ,:-

वो आगे बताता हूं,की वैसे श्री राम के विवाह में इनके शिव धनुष को एक क्षत्रिय ने तोड़ने ओर लक्ष्मण में इनका घमंड तोड़ने के विवाद के चलते श्री राम ने इनके ही धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर ओर इन पर ही तीर चलाकर इनका तेज हर कर ओर अपना असल रूप दिखा कर इन्हें तेजहीन करके बस इनके तीनो लोको में आने जाने की शक्ति को छिनने से छोड़कर महेंद्र पर्वत पर इन्हें की,तुम ब्राह्मण हो यो नहीं मारा है,ओर ब्राह्मण को तपस्या करनी ओर क्षत्रियों को विद्या सीखने का अधिकार है,यो वही उत्तम लगता है,तो जाओ, तुम अब तपस्या को जाओ,वहां से प्रस्थान करा भेज दिया था।
2-इन्होंने अपने पिता ऋषि जमदग्नि के कहने पर अपनी माता रेणुका का वध कर दिया था।और पिता की आज्ञा पालन के कर्म से प्रसन्न पिता के वरदान से अपनी माता रेणुका को जीवन दान दिलाया ओर मातृऋण से मुक्ति को तपस्या की।

3-केरल राज्य की स्थापना:-

ऐसे ही केरल में मान्यता है कि ये जगह परशुराम के फरसा फेंकने की वजह से बनी थी।कथा ये है कि जब महर्षि परशुराम ने क्षत्रियों को मारना बंद कर दिया, तो उन्होंने रक्त से सना अपना परशु यानी फरसा समुद्र में फेंक दिया।इससे देख कर, समुद्र इतना भयभीत हो गया कि,उसने उस फरसा गिरने वाली जगह को त्याग कर,वहां से बहुत पीछे हट गया।यो समुद्र के पीछे हटने से जो जगह बनी,वही जगहां केरल प्रदेश बन गई।इसी मान्यता के आधार पर केरल में परशुराम की पूजा की जाती है।
जबकि इस कथा का खंडन देखो, इस प्रमाण के साथ,,की,
केरल में ओणम त्योहार पर महर्षि परशुराम की पूजा होती है,जबकि केरल में ये त्योहार पहले से ही,वहां के विष्णु जी के भक्त,दैत्यराज महान महाराजा बलि के महान पराक्रम ओर महान दान के स्मरण में मनाया जाता है। मान्य कथा ये है कि विष्णु जी ने अपने वामन अवतार को धारण करके बलि से सम्पूर्ण पृथ्वी की जमीन दान में मांगी थी।महाराजा बलि के वचन भरने पर उन्होंने अपना शरीर बड़ा करके पहले कदम में बलि का पूरा राज्य ही मांग लिया ओर अंत में इस सबसे प्रसन्न होकर वरदान स्वरूप बलि को अमर होने का वरदान दिया और इसी धार्मिक कथा की मान्यता के अनुसार ही महाराजा बलि के इस महान कर्म के स्मरण में ही, हर साल ओणम के भक्तजन दूर दूर से केरल आते हैं ओर केरल के लोग ये त्योहार मनाते हैं।
तो यहां प्रमाणिक तर्क ये है कि वामन अवतार विष्णु जी का पांचवा अवतार है,जबकि कथित अवतारवाद लेखन के अनुसार महर्षि परशुराम उनका छठा अवतार है। इससे ये साबित होता है कि महाराजा बलि का राज्य वहां पहले से ही था ओर जब उनका राज्य पहले से था, तो बहुत सीधी समझ की बात ये है कि केरल का अस्तित्व परशुराम से पहले से रहा है।यो ये उनकी केरल की भूमि को जन्म देने की कथा,बिलकुल झुठी सिद्ध होती है।
तब असल छठा अवतार कौन है?वो है,महर्षि विश्वामित्र जी..
ये क्षत्रिय कुलवंशी महाराजा सत्यव्रत नाम के चक्रवर्ती सम्राट हुए,जिनका नाम आगे चलकर क्षत्रिय से ब्रह्मबल प्राप्ति के कारण ही ब्रह्मर्षि ओर महर्षि विश्वामित्र कहलाया।
ओर इनके ये महान कार्य है,जिन्हें पूरी तरहां भृष्ट किया गया है,ताकि ये छठे अवतार से हटा दिए जाएं और इनकी जगहां परशुराम को स्थापित किया गया।
इसके पीछे बड़ी ब्राह्मणवादी षड़यन्त्रकारी योजना का ब्राह्मणवादी अभियान है,,
ये क्षत्रिय विरुद्ध ब्राह्मण युद्ध कथा का प्रारम्भ,विश्वामित्र ओर वशिष्ठ के परस्पर वर्चस्व को लेकर प्रारम्भ हुआ,जो परशुराम पर जाकर,उनके अवतार बनाये जाने पर कहीं ठहरा,,
विश्वामित्र ओर वशिष्ठ की कथा तो सबको पता है,,
तो वहीं आप देखेंगे कि,वशिष्ठ उस समय के केवल राज्य पुरोहित ही रहे थे,वे उस काल के राजाओं के विजय यज्ञ ओर राज्य उन्नति आदि के यज्ञकर्ता रहे,यही आप सारी कथाओं में भलीभांति जांच सकते है।
जैसे-विश्वामित्र के सम्राट होने के समय राज्य पुरोहित होना और आगे राम राज्य में भी दशरथ के राज्य पुरोहित होना,तभी केवल इनसे राजा अपने निर्णय के समर्थन को आशीर्वाद मांगते थे,न कि इनका ही निर्णय,,यो वहां राम का विश्वामित्र द्धारा वन रक्षा को ले जाने पर दशरथ को केवल उपयोगी ज्ञान देने की,विश्वामित्र के साथ जाने दो,वे इन्हें समस्त शस्त्र अस्त्र ओर शास्त्र ज्ञान के साथ राज्य रक्षा कराकर राजा योग सिद्ध कराएंगे ओर देखे,की श्री राम को विश्वामित्र ने समस्त दिव्य अस्त्र दिए और महाज्ञान दिया और सीता स्वयंवर में लेजाकर शिव धनुष तुड़वाकर परशुराम का घमंड तुड़वाया ओर स्वयं को विष्णु अवतार की पहली झलक दिखलवाई।
विश्वामित्र विश्व के सबसे पहले राजा रहे,जिन्होंने केवल सच्चे वेदों के ज्ञान को प्रकट करने वाली गायत्री शक्ति को अवतरित किया,जिस गायत्री की साधना करने से ही तभी वेद पढ़े जा सकते है,अन्यथा इनसे पहले के ऋषि वेदों के अधूरे ज्ञान को ही पढ़ रहे थे। ओर उसके मुख्य सिद्धांत की-अपनी आत्मा को जानो,अपने पुरुषार्थ के बल को प्रकट करो,वही ईश्वर है,को प्रकट किया।
विश्वामित्र ने ही,अपने ही वंश के राजा सत्यव्रत यानी त्रिशंकु को जिसे व्यास ने स्वर्ग पहुँचाने के सभी दान पुण्य करने के बाद भी अपनी असामर्थ्यता को नहीं कहकर,उसी में ओर दोष निकाल मना कर दिया और फिर व्यास के पुत्र के पास जाने पर उसने भी यही किया और व्यर्थ में शाप देकर त्रिशंकु बना दिया,तब विश्वामित्र ने ही अपनी शरण मे आये त्रिशंकु को साक्षात नया सप्तऋषि मंडल ओर नया स्वर्ग बनाकर मनचाहे समय तक को वहां रहने का अधिकार दिया,जो आज तक इनसे पहले किसी ऋषि,महर्षि व व्यास आदि से लेकर ब्रह्मा विष्णु,शिव भी किसी को नहीं दे पायें थे।
ओर तो ओर विश्वामित्र की महानता की इस कथा के बाद उस स्वर्ग का क्या हुआ? आदि कथाओं को भी मिटा दिया गया।
विश्वामित्र के चरित्र को भृष्ट करने के लिये उन्हें तपभृष्ट बताया है,जबकि उन्होंने मेनका से शकुंतला पुत्री को जन्म दिया,जिसका विवाह महाराजा दुष्यंत से हुआ और उनसे ही भरत जैसा सूर्यवंशी हुआ,जिसके नाम और ये भारत देश का नाम है,तो कैसे हुए,विश्वामित्र तपभृष्ट?तपभृष्ट वो होता है,जो उस कर्म जे बाद फिर किसी भी कर्म करने लायक ही नहीं रहे,जबकि उसी कर्म के बाद ही विश्वामित्र ने गायत्री की अवतरित आदि महान कर्म किये थे।
वैसे भी महर्षि परशुराम भी खुद महर्षि विश्वामित्र के बहिन के बेटे यानी भांजे थे।और दोनों का जन्म भी अक्षय तृतीया को हुआ था,जिसे केवल परशुराम के ही जन्मदिवस को बना दिया गया है और ग्रन्थों में से महर्षि विश्वामित्र के जन्मदिवस को लापता कर दिया गया है।
जो भागवत में इस प्रकार से दिया गया है कि,,
1-ब्रह्मा के पुत्र ऋषि अत्रि थे, जिनकी आँखों से चन्द्रमा का जन्म हुआ ओर चन्द्रमा के पुत्र थे बुध ओर बुध के पुत्र हुए पुरुरवा।
2-पुरुरवा – ओर पुरुरवा व उर्बशी से 6 पुत्र हुए। पुरुरवा के पांचवें पुत्र विजय के कुल में पुरुरवा से आगे 10 वें हुए गाधि ओर इन्हीं गाधि के पुत्र थे,ये विश्वरथ यानी विश्वामित्र।
3-महाराज गाधि की कन्या सत्यवती के पुत्र महर्षि जमदाग्नि के छोटे पुत्र थे महर्षि परशुराम।
4-ये सत्यवती ही बाद में कौशकी नदी बन गयी थी ।
5-कौशकी नदी में शमीक मुनि के पुत्र श्रृंगी ऋषि आचमन करके सम्राट परीक्षित को श्राप दिया था।
6-महाराज पुरुरवा के पहले पुत्र आयु के 5 पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र नहुष के बंश में ये महान व्यक्ति हुए :—
1- ययाति दूसरे पुत्र थे ।
2- ययाति की दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु के बंश में :–
3- पुरु के बाद हस्ति 20 वें थे ।
4-पूरुके बाद 24 वाँ थे कुरु ।
5- पुरु के बाद 25 वाँ थे जयद्रत।
6-पुरु के बाद 28 वाँ थे पांचाल ।
7-पुरु के बाद 32 वाँ थे द्रुपद ।
8-ययाति की पहली पत्नी थी-दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री , देवयानी , जिससे यदु का जन्म हुआ और इसी यदु कुल में श्री कृष्ण व बलराम का अवातार हुआ।
ठीक ऐसे ही इनके पुत्री शकुंतला का विवाह महाराज दुष्यंत से हुआ,ओर उनसे महाराजा भरत।
राजा दुष्यंत के पश्चात भारत ने राज्य की बागडोर संभाली और राज को एक देश में परिवर्तित कर दिया। अब राजा भारत चक्रवर्ती सम्राट बन गया। दया करूणा शूरवीरता तथा बंधुभाव का अनोखा संगम उसकी राजसत्ता की प्रमुख विशेषता थी। उन्होंने अपने राज्य की सीमा का विस्तार सम्पूर्ण आर्यावर्त (उत्तरी, मध्य भारत ) में कर लिया । अश्वमेघ यज्ञ कर उन्होंने चक्रवती सम्राट की उपाधि प्राप्त की| चक्रवती सम्राट भरत ने राज्य में सुदृढ़ न्याय व्यवस्था और सामाजिक एकता (सदभावना) स्थापित की. उन्होंने सुविधा के लिए अपने शासन को विभिन्न विभागों में बाँट कर प्रशासन में नियन्त्रण स्थापित किया. भरत की शासन प्रणाली से उनकी कीर्ति सारे संसार में फ़ैल गयी |
भरत का विवाह विदर्भराज की तीन कन्याओं से हुआ था। तीनों के पुत्र हुए। भरत ने कहा कि एक पुत्र भी उनके अनुरूप नहीं है। भरत के शाप से डरकर उन तीनों ने अपने-अपने पुत्र का हनन कर दिया। तदनंतर वंश के बिखर जाने पर भरत ने ‘मरूत्स्तोम’ यज्ञ किया। मरूद्गणों ने भरत को भारद्वाज नामक पुत्र दिया। भारद्वाज के जन्म की विचित्र कथा है। बृहस्पति ने अपने भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता का बलपूर्वक गर्भाधान किया। उसके गर्भ में ‘दीर्घतमा’ नामक संतान पहले से ही विद्यमान थी। बृहस्पति ने उससे कहा- ‘इसका पालन-पोषण (भर) कर। यह मेरा औरस और भाई का क्षेत्रज पुत्र होने के कारण दोनों का (द्वाज) पुत्र है।’ किंतु ममता तथा बृहस्पति में से कोई भी उसका पालन-पोषण करने को तैयार नहीं था। अत: वे उस ‘भारद्वाज’ को वहीं छोड़कर चले गये। मरूद्गणों ने उसे ग्रहण किया तथा राजा भरत को दे दिया | इसका एक नाम ‘सर्वदमन’ भी था क्योंकि इसने बचपन में ही बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन किया था। और अन्य समस्त वन्य तथा पर्वतीय पशुओं को भी सहज ही परास्त कर अपने अधीन कर लेते थे। अपने जीवन काल में उन्होंने यमुना, सरस्वती तथा गंगा के तटों पर क्रमश: सौ, तीन सौ तथा चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। प्रवृत्ति से दानशील तथा वीर थे। राज्यपद मिलने पर भरत ने अपने राज्य का विस्तार किया। प्रतिष्ठान के स्थान पर हस्तिनापुर को राजधानी बनाया।
भरत के देहावसान के बाद उसने अपने पुत्र वितथ को राज्य का भार सौंप दिया और स्वयं वन में चला गया। इन्हीं भरत के कुल में शांतनु हुए। भरत के वंश में आगे जाकर प्रतीप नामक राजा हुए। प्रतीप के बाद उनके पुत्र शांतनु राजा हुए। एक बार शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगातट पर जा पहुंचे। उन्होंने वहां एक परम सुंदर स्त्री देखी। उसके रूप को देखकर शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उसका परिचय पूछते हुए उसे अपनी पत्नी बनने को कहा। उस स्त्री ने इसकी स्वीकृति दे दी लेकिन एक शर्त रखी कि आप कभी भी मुझे किसी भी काम के लिए रोकेंगे नहीं अन्यथा उसी पल मैं आपको छोड़कर चली जाऊंगी। शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली तथा उस स्त्री से विवाह कर लिया। इस प्रकार दोनों का जीवन सुखपूर्वक बीतने लगा। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है? उस स्त्री ने बताया कि वह गंगा है तथा जिन पुत्रों को उसने नदी में डाला था वे वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई।
शांतनु की पत्नी गंगा के पुत्र भीष्म थे और शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती के दो पुत्र हुए- चित्रांगद और विचित्रवीर्य। ‍भीष्म ने भीष्म प्रतिज्ञा ली थी इसलिए उनका वंश नहीं चला। चित्रांगद तो गंधर्वों से युद्ध करते हुए मारा गया। विचित्रवीर्य की दो पत्नियां अम्बिका और अम्बालिका थीं। विचित्रवीर्य कामी और सुरापेयी था। उसे राजयक्ष्मा हो गया और वह असमय में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। सत्यवती और भीष्म को कुल और वंश नष्ट होने की चिंता होने लगी तब सत्यवती ने राजमाता होने के कारण व्यास द्वैपायन को बुलवाया, जो पुत्र दे सके। सत्यवती की कुमारी अवस्था में ही व्यास द्वैपायन का जन्म हुआ था| समागम के समय व्यास की कुरूपता को देखकर अम्बिका ने नेत्र मूंद लिए। अत: उसका पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध पैदा हुआ। अम्बालिका व्यास को देखकर पीतवर्णा हो गई, इससे उसका पुत्र पाण्डु पीला हुआ। सत्यवती ने एक और पुत्र की कामना से अम्बिका को व्यास के पास भेजा, लेकिन उसने अपनी दासी को भेज दिया। दासी से विदुर का जन्म हुआ। इस तरह देखा जाए तो भरतवंश की जगह बाद में व्यास द्वैपायन का वंश चला। इस प्रकार इस वंश के सब राजा ‘भरतवंशी’ कहलाए। उस असाधारण सम्राट के नाम से यह देश भारतवर्ष के नाम से जाना जाने लगा।
इस विषय पर मेरे अनेको प्रमाणिक लेख है,इन्हें आप अगले कुछ लेखों में प्रमाण सहित पढ़ सकते है,,

विशेष:-मेरा यहां किसी को अपमानित करना उद्धेश्य नहीं है,बल्कि शास्त्रों में की गई,भ्रमपूर्ण कथाओं में छिपे सच्च को सामने लाने का ज्ञानमयी प्रयास है,इसका निर्णय तो पढ़ने वाले ही करेंगे,,

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी
Www.satyadmeemission.org

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