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20 अप्रैल महान संत श्री धन्ना भक्त के जन्मोउत्सव पर सत्यास्मि मिशन की “भक्ति में शक्ति” भावार्थ पर कविता रूपी शुभकामनायें???

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20 अप्रैल सन् 1415
जन्में धुआँ कला गांव।
जिला टोंक राजस्थान प्रदेश में
रामेश्वर जाट पितृ की छाँव।।
धन्य धन्य जाट धन्ना भगत
तेरी सरल भक्ति अपार।
भगवान भाव से पूज कर पत्थर
भक्ति ही कर्म धर्म का सार।।
धनकोर एक बहिन थी
जीवन कृषक सहज सरल।
ब्याह हुआ अमृतसर दीपा
बीत रहा था जीवन सरल।।
फिर भी अभाव शेष था ह्रदय
जीवन लगे एकांत नितांत।
देखता मंदिर पूजा होती
भक्ति और बढ़ा मन अशांत।।
पूछ पुजारी कैसे हो पूजा
मैं भी लगाऊ ईश्वर भोग।
देख भक्ति की सरल द्रढ़ता
पुजारी दे शालिग्राम अयोग।
शालिग्राम ले जा धन्ना ने
उन्हें लगाया प्रातः भोग।
रोटी लस्सी रखी सजा कर
पर लगाया नही ईश्वर ने भोग।।
बार बार विनती करता था
और कहता रहता हुयी क्या कमी।
मैं भी तेरे बाद ही खाऊ
भूखा हठ में लेट गया जमी।।
देख सरलता ईश्वर प्रकट
और लस्सी पी और रोटी खायी।
बोले धन्ना उठो तुम खाओ
मैं प्रसन्न सरल भक्ति अथाई।।
ये सब देख ह्रदय भरा धन्ना
ईश बचा खुद खाया भोग।
बोले प्रभु प्रसन्न यदि हो
मुझको दो नित दर्शन सुयोग।।
और मैं बुलाऊ तब तब आना
मेरा साथ नही करना त्याग।
तथास्तु कह इष्ट ईश्वर बोले
यूँ धन्ना ईश्वर प्रेम हुआ सुभाग।।।
धन्ना को जहाँ पड़े जरूरत
वहीं ईश्वर करते कर पूर्ण।
यहीं लोककथा प्रचलित
धन्ना सरल भक्ति हुयी सम्पूर्ण।।
पर भक्ति योग का यही रहस्य है
यहाँ तक भक्ति पूर्वजन्म।
सरलता आज भी कितनों को है
पर नही मिलता यूँ भक्ति श्रम।।
पूर्वजन्म भक्ति से जागी
कुलकुंडलिनी जगी इस चित्त एकाग्र।
और हुए इष्ट भाव के दर्शन
ये उतकल उत्कंठा परिणाम एकाग्र।।
यूँ यहाँ तक अनेक भक्त को होती
जैसे मीरा और अनंत भक्त संत।
तब इष्ट ही कयूँ ना ज्ञान है देता
इससे आगे क्या ईश्वर पंथ।।
तब आवश्यकता गुरु की पड़ती
वही बताये और दिखाए मार्ग।
साथ देता मिटा योग पथ कंटक
पहुँचा देता स्वं आत्म के मार्ग।।
तब धन्ना ने ये भी जाना
की दर्शन से नही केवल तृप्ति।
जो इच्छा हो होती है पूरी
ये केसी भक्त ईश वियोग विभक्ति।।
इसे ना अपना इष्ट बताता
ना स्वयं समझ आती अज्ञेय बात।
तब कौन जानता इस दुर्गम पथ को
जो बने मुझ साहयक इस ज्ञात अज्ञात।।
तब इष्ट छोड़ गुरु खोज की बढ़ती
निरन्तर ह्रदय गुरु संगत प्यास।
यही बढ़ती चली धन्ना में
और मिले रामानंद महागुरु पूर्णव्यास।।
सच्च में गुरु इसी अवस्था मिलता
इससे पहले उसकी नही पहचान।
ज्यों हीरा मिले चाहे उपहार भिखारी
वो समझ फेंक दे काँच अज्ञान।।
रामानन्द ने राम नाम दे
किया कृपा का शक्तिपात।
धन्ना कुंडलिनी चढ़ी ह्रदय से
उर्ध्व सप्तम चक्र कर नात।।
तब दर्शन हुए परम् सत्य के
स्वयं की आत्मा हुयी अनभूत।
मैं ही इष्ट और भक्त हूँ
दो मिल हुए एक आत्मविभूत।।
यही पहुँच सब गाये गीत्
की हमे मिलाएं गुरु ही मीत।
गुरु बिन नही कोई तारक जग से
गुरु ही सच्चा ईश्वर स्वयंजीत।।
रामानन्द हो या गुरु हो कोई
सभी सगुण से निर्गुण दाता।
मंत्र चाहे कोई हो जग का
सभी का अंत निर्गुण ही पाता।।
यहाँ निर्गुण अर्थ निर्विकार समाधि
सगुण अर्थ दर्शन है भाव।
भाव अभाव जब तक हो साधक
वो नही पा सकता आत्मस्वभाव।।
इस चक्कर में कभी ना पड़ना
कोई मंत्र है बड़ा या छोटा।
यदि मंत्र पीछ नही गुरु शक्ति
तो सभी मंत्र पा मानुष खोटा।।
गुरु अर्थ नही किसी पंथ गुरु है
गुरु अर्थ जो मुक्ति दाता।
शिष्य चाहे इष्ट करे कोई दर्शन
सिद्ध गुरु उसे सत्य मार्ग पहुँचाता।।
यही हुया धन्ना के संग
इष्ट गोपाल और गुरु राम मत पथ।
फिर भी किया स्वं अंगीकार।
कर निज शक्तिपात पहुँचाया सत के गत।।
यही हुआ मीरा संग भक्ति
इष्ट कृष्ण और गुरु रैदास निर्गुण।
भर शक्ति मीरा की भक्ति
उसे पहुँचाया कृष्ण अंग सगुण।।
यो भक्तों इस कथा से जानो
गुरु बिन नही कोई ज्ञान।
जो गुरु होते भी सोता
उसे दर्शन नही हो निज अभिमान।।
भक्तों इस कथा से जानो
की चाहे भक्ति हो कितनी उच्चतर।
बिन गुरु नही होय पूर्णता
बिन गुरु शक्ति नही भक्ति प्रखर।।
जब तक भक्ति नही आती
जब तक शिष्य रहे निज अहंकार।
चाहे गुरु वरण करो कोई
बिन अहं त्यागे नही भक्ति साकार।।
यो गुरु बनाओ भक्ति रख कर
और अपने अहं का त्याग करो।
गुरु मिले तभी ही सच्चा
वरन गुरु हो कर भी वियोग करो।।
भक्ति आती गुरु कथन कर सेवा
और गुरु मंत्र का कर नित जाप।
गुरु वचन सदा शिरोधार्य करके
मिले आत्ममोक्ष कट सारे शाप।।
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