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9 जुलाई गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर विश्वगुरु भगवान विश्वामित्र और सत्यवादी सूर्यवँशी महाराज हरिश्चंद्र की अमर कथा

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भारत की भूमि पर अनेक प्रतापी-महाप्रतापी राजाओं ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने विशिष्ट गुणों के चलते अपना नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से वर्णित करवाया है। इनमें से बहुत से ऐसे भी हैं जिनका हमारे पौराणिक इतिहास से बहुत ही गहरा नाता है। इन्हीं प्रतापी राजाओं में से एक हैं जो सूर्यवंशी सत्यव्रत जिनको स्वर्गारोहण की इच्छा के मनोरथ की पूर्ति को वशिष्ठ ने मना कर दिया और वशिष्ट पुत्र ने अनावश्यक ही त्रिशंकु होने का शाप दिया था और उस शाप का निराकरण और उनकी इच्छा की पूर्ति उनके पूर्वज और श्री गुरुदेव विशामित्र जी नवीन स्वर्ग का निर्माण करके पूर्ण की ये उन्ही सत्यव्रत के पुत्र राजा हरिश्चंद्र थे, जिन्हें उनकी सत्यनिष्ठा के लिए आज भी जाना जाता है।राजा हरिश्चंद्र हर परिस्थिति में केवल सच का ही साथ देते थे। अपनी इस निष्ठा की वजह से कई बार उन्हें बड़ी-बड़ी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने किसी भी स्थिति में सच का साथ नहीं छोड़ा। वे एक बार जो प्रण ले लेते थे उसे किसी भी कीमत पर पूरा करके ही छोड़ते लेकिन एक बार राजा हरिश्चंद्र भी सच का साथ देने से चूक गए, जिसका परिणाम उनके पुत्र को अपनी प्राण देकर चुकाना पड़ा। राजा हरिश्चंद्र काफी लंबे समय तक पुत्र विहीन रहे।
तब भगवान विश्वामित्र ने महाराज हरिश्चंद्र को एकादशी का निर्जल व्रत के साथ पँच व्रत कर्मविधि पूर्णिमा के दिन तक बताई की एकाद्शी को निर्जला व्रत रखते हुए आगामी तीन दिन सामान्य यज्ञानुष्ठान के साथ फलाहारी व्रत करें और पूर्णिमा के दिन आत्मध्यान करोगे तो शीघ्र मनोरथ सम्पूर्ण होगा और जो पूर्णिमा देवी वचन कहे उसे अवश्य पूर्ण करना ये कह कर महर्षि अपने आश्रम चले गए तब राजा हरिश्चंद्र ने वेसा ही किया तब पूर्णिमा ने दर्शन देकर कहा की हे राजन तुम्हारे मनोरथ के प्राप्ति को मेरी एक मांग है जो तुम्हारी परीक्षा भी है की
कि उन्हें पुत्र प्राप्ति उपरांत यज्ञ में अपने पुत्र को पँच वर्ष को मुझे देना होगया।उसके उपरांत मैं उसे पुनः वापस कर दूंगी जिससे तुम्हें जो निसंतान का ग्रहण योग है वो भी पूर्ण हो जायेगा और पुनः मेरे द्धारा उसे पँच वर्ष तक विद्या प्राप्त करने के उपरांत वापस करने से तुम्हें पुनः पुत्र की प्राप्ति हो जायेगी यो दोनों कार्य पूर्ण हो जायेंगे ये सुनकर पहले तो राजा हरिश्चंद्र इस बात के लिए राजी हो गए लेकिन पुत्र रोहिताश्व के जन्म के बाद उसके मोह में इस तरह बंध गए कि अपना दिया हुआ वचन उनके लिए चिंतनिय हो गया।की कहीं मानो मेरा पुत्र पूर्णिमा देवी ने वापस नही किया तो तब क्या होगा यो पूर्णिमा देवी के कई बार पुत्र को लेने को आई लेकिन हर बार हरिश्चंद्र अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाए।देवी ने कहा की राजन तुम इस पुत्र मोह वश इष्ट और गुरु वचन अवज्ञा कर रहे हो यो मैं माँ हूँ यूँ तुम्हें शाप नहीं दे सकती हूँ परंतु इस अवज्ञा का परिणाम समयानुसार अवश्य मिलेगा यो पूर्णिमा देवी अंतर्ध्यान हो गयी समयानुसार पुत्र मोह के कारण अपनी प्रतिज्ञा का पालन ना कर पाने की वजह से राजा हरिश्चंद्र को अपना सब कुछ गंवाना पड़ा, जिसमें राज-पाट के साथ-साथ उनकी पत्नी और वो पुत्र भी सम्मलित है।तब गुरु और इष्ट पूर्णिमा की अवज्ञा का परिणाम इन्हें शीघ्र ही इस प्रकार कालांतर में झेलना पड़ा की जिसका राजा हरिश्चंद्र के जीवन की एक महान घटना से और व्रत से भी जुड़ा है जिसका संबंध आज भी एकादशी से पंचवर्ति पूर्णिमा व्रत के महत्व और उसकी गरिमा के साथ जुड़ा हुआ है। एक बार राजा हरिश्चन्द्र ने सपना में देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट अपने श्री गुरुदेव विश्वामित्र को दान में दे दिया है।और वे आये है अपने राज्य को मांग रहे है तथा सिंहासन पर बेठे है और ये याचक की भांति उनके आगे हाथ जोड़े खड़े है ठीक यही घटना आगामी दिन घटी की अगले दिन जब गुरुदेव विश्वामित्र जी उनके महल में आए तो उन्होंने नमन करते गुरुदेव विश्वामित्र को अपना सारा स्वप्न व्रतांत सुनाया और साथ ही वचनानुसार अपना राज्य उन्हें सौंप दिया तब जाते-जाते गुरुदेव विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि “पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए।” इस पर विश्वामित्र हंसने लगे और राजा को स्मरण दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता।तब ये सुन कर राजा ने सदूर जाकर अपनी पत्नी तारा और पुत्र को महाजन के हाथ बेचकर स्वर्ण मुद्राएं एकत्र की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने स्वयं को भी बेच डाला और लौटकर सोने की सभी मुद्राएं श्री गुरुदेव विश्वामित्र को दान में दे दीं।राजा हरिश्चंद्र ने स्वयं को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था, जो शवदाह के लिए आए मृतक के परिजन से कर लेकर उन्हें अंतिम संस्कार करने देता था। उस चांडाल ने राजा हरिश्चंद्र को अपना काम सौंप दिया। राजा हरिश्चंद्र का कार्य था कि जो भी व्यक्ति शव लेकर उसके अंतिम संस्कार के लिए श्मशान में आए उससे कर वसूलने के बाद ही अंतिम संस्कार की अनुमति दी जाए।राजा हरिश्चंद्र ने इसे अपना कार्य समझ लिया और पूरी निष्ठा के साथ उसे करने लगे। एक दिन ऐसा भी समय आया जब राजा हरिश्चंद्र का अपने जीवन के सबसे बड़े दुख से सामना हुआ। अर्धरात्रि का समय था और राजा हरिश्चंद्र श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव् था और वह स्त्री इतनी निर्धन थी कि उसने अपनी साड़ी को फाड़कर उस वस्त्र से अपने पुत्र के शव के लिए कफन तैयार किया हुआ था। राजा हरिश्चंद्र ने उससे भी कर मांगा लेकिन कर की बात सुनकर वह स्त्री रोने लगी। उसने राजा से कहा कि उसके पास बिल्कुल भी धन नहीं है।इधर वर्षा के कारण पूर्णिमा का दिन होते हुए भी घनघोर मेघों के कारण घुप्प अंधकार छाया था तब जैसे ही आकाश में बिजली चमकी तो उस बिजली की रोशनी में हरिश्चंद्र को उस अबला स्त्री का चेहरा नजर आया, वह स्त्री उनकी पत्नी तारावती थी और उसके हाथ में उनके पुत्र रोहिताश्व का शव था। रोहिताश्व की सांप काटने की वजह से अकाल मृत्यु हो गई थी।अपनी आँखों से अपनी पत्नी की यह दशा और पुत्र के शव को देखकर हरिश्चंद्र बेहद भावुक हो उठे। उस दिन उनका एकादशी से प्रारम्भ पंचवर्ति पूर्णिमा का अंतिम व्रत भी था और परिवार की इस हालत ने उन्हें हिलाकर रख दिया। उनकी आंखों में आंसू भरे थे लेकिन फिर भी वह अपने कर्तव्य की रक्षा के लिए आतुर थे तब भारी मन से उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि जिस सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने अपना महल, राजपाट तक त्याग दिया, स्वयं और अपने परिवार को बेच दिया, आज यह उसी सत्य की रक्षा की घड़ी है।तब राजा हरिश्चंद्र ने कहा कि कर लिए बिना मैं तुम्हें भीतर प्रवेश करने की अनुमति नहीं दूंगा। यह सुनने के बाद भी रानी तारामती ने अपना धीरज नहीं खोया और साड़ी को फाड़कर उसका टुकड़ा कर के रूप में उन्हें दे दिया ये सब देख तब उसी समय पूर्णिमा देवी के साथ स्वयं गुरुदेव विश्वामित्र प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा “हरिश्चन्द्र! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में सत्यवादी हरिश्चंद्र के नाम से अमर रहोगे।”
तब महाराज हरिश्चंद्र ने देवी पूर्णिमा और गुरुदेव विश्वामित्र से नमन कर कहा “यदि सत्य में मेरी कर्तव्यनिष्ठा और सत्य के प्रति समर्पण सही है तो कृपया इस स्त्री के पुत्र को जीवनदान दीजिए”।ये सुन पूर्णिमा और विश्वामित्र ने तथावस्तु कहा जिसके फलस्वरुप रोहिताश्व जीवित हो उठा।और इसी सत्यवादिता की कठिन परीक्षा में अपने शिष्य को सम्पूर्ण उत्तीण होने की प्रसन्नता से गुरुदेव भगवन विश्वामित्र ने अपने प्रिय हरिश्चंद्र को उनका राजपाठ और भी वैभव सहित बनाकर वापस लौटा दिया।और इनके वंश पर देवी पूर्णिमाँ और भगवन विश्वामित्र की सदैव कृपा बनी रही।
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