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9जुलाई गुरु पूर्णिमा पर्व पर भगवती वेदमाता गायत्री और भगवन विश्वामित्र की सत्यज्ञान कथा:-

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जब वशिष्ट से आतिथ्य प्राप्त करने पर उनके पास कामधेनु गाय की सामर्थ्य देखी तब उन्होंने वशिष्ट से कहा की तुम ऋषि हो तुम्हे इसकी इतनी आवश्यक्ता नही है जितनी जनकल्याण को राजा और उसकी प्रजा को होती है ये माता गाय राजा के यहॉ प्रजा के अकाल समय में सहायता हेतु उपयोगी है तुम्हारा तो कुछ गायों से ही अपना दैविक और दैनिक कार्य चल जायेगा इसी पर महर्षि वशिष्ठ के जनकल्याण को सहायता नही करने के कारण विवाद हुआ तभी क्षत्रबल की पराजय और तपोबल की विजय ने विश्वामित्र को विश्व का सर्वोच्च तपोबली और प्रथम वेदिक विधि से बिना किसी देव देवी आश्रय प्राप्त किये केवल अपनी आत्मा का विस्तृत स्वरूप ही परमात्मा है और स्वंमेव ही ब्रह्म हूँ स्वमेव ही सनातन सत्य हूँ यही आत्मभाव को धारण कर वैदिक ज्ञानुसार आत्मसाक्षात्कार किया।क्योकि ये ब्रह्मा के पुत्र कुलवंशी परम्परा में गाधि पुत्र और तपोबल से उतपन्न हुए थे इन्हें स्वयं ब्रह्मा ने राजतंत्र के नियमानुसार की इस पृथ्वी पर जो चर्तुर्थ वेद है उनमें जो मूल शक्ति है वह अभी प्रकट नही हुयी है और जो भी उस काल में वतमान ऋषि है वे सब अपूर्व वेदिक अध्ययन करते साधनागत है यो तुम क्षत्रिय हो तुम्हारा कर्त्यव्य है की धर्म की रक्षा करते हुए उस वेदिक धर्म की मूल शक्ति को प्रकट करो तब ये अपने राज्यकर्मो में इतने लिप्त हो गए की उस दिशा में ब्रह्म वाक्य को कर्म में लाना विस्मरण कर गए उसी हेतु ये वशिष्ठ और इनका विवाद की घटना घटी और तब ये अपने ब्रह्मज्ञान को पहले शिव उपासना से शिवशक्ति को जाग्रत किया इसके उपरांत ब्रह्म देव की आराधना से ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया और उसके भी उपरांत वेदिक धर्मानुसार यज्ञानुष्ठान करते हुए वेदों की मूल शक्ति गायत्री को प्रकट किया परंतु इस वेदिक गायत्री शक्ति की भी सामर्थ्य को इन्होंने संसार और प्रकर्ति के ही वशीभूत पाया क्योकि गायत्री के आवाहन के उपरांत इनके मनोरथ की सत्यव्रत त्रिशंकु को स्वर्ग भेज दे उस मनोरथ को विभिन्न प्राकृतिक नियमावली के अनुसार निषेध बताते हुए असामर्थ्यता पायी तब इन्होंने गायत्री को कीलित किया की जो सिद्धि मेरे किसी संसारी या अलौकिकता को सम्पूर्ण करने में सक्षम नही है उसको संसार के समक्ष प्रस्तुत करके अकल्याण और अपूर्णता ही सिद्ध करूँगा यो गायत्री को एक उपादान ही बताया और गायत्री के शाप विमोचन को अपने नामोच्चारण के साथ ब्रह्म शक्ति के नामोच्चारण के उपरांत ही सफलता देने वाली सिद्धि देकर मुक्त किया तब गायत्री के सत्यार्थ को प्रकट किया यो वो
गायत्री का सत्यार्थ ये है की जो ज्ञेय है यानि आत्मा उसके त्रिकारणो-कर्ता+कर्म+कारण को जाने ही गायत्री कहलाती है।यही इन्होंने किया कर्ता कौन है स्वयं और कर्म किसके है स्वयं के और इन कर्मो का कारक और उपयोगिता व् उपभोगता आदि कौन है स्वयं यो जो ये स्वयं है इसकी अनंतता को प्रकट करना ही गायत्री अर्थ है यो मंत्र के सत्यार्थ को जाने बिना जो जपता है उसे कोई फल नही प्राप्त होता है यही भगवन विश्वामित्र का जीवन दर्शन और उपदेश है।
तब इससे आगे बढ़कर केवल और केवल सर्वदेव देवी व् अप्राकृतिक पराशक्तियों से भी उर्ध्व स्वयं की आत्मा के बल को जाग्रत किया और तब जो चाहा वही प्रकर्ति और अप्राप्रकृति परे आत्मसिद्धि को संसार के समक्ष प्रकट करते सिद्ध किया जिसका इन्ही के वंशज और प्रथम भगवान श्री राम को शिष्य दीक्षा देते हुए सर्वश्रेष्ठ आत्मसाक्षात्कारी बनाने में साहयक ज्ञान दिया।
यही आगामी इन्ही के वंशजों में ये आत्मज्ञान प्रकाशित होता गया जिसे जानकर श्री कृष्ण जी ने स्वंमेव को गीता में कहा की मैं स्वयं की प्रकर्ति को वशीभूत करते हुए आजन्मा हूँ यो मैं आत्मसाक्षात्कारी परम् पुरुष हूँ मैं ही सत्य हूँ यही तो वेदिक आत्मज्ञान है प्राचीन सनातन धर्म में वर्णव्यवस्था का क्रम कर्मो के क्रमबद्धाधार के स्वरूप से था की ब्रह्मचर्यकाल शिक्षाकाल था और जो शिक्षा पायी उसका उपयोग अपने स्वेच्छित अनुसार कार्य को करते हुए ग्रहस्थ में उपयोग करते हुए अपनी सन्तान को ज्ञान प्रदान करना इसके उपरांत ग्रहस्थ धर्म को पूर्ण करके एकांत में जो पाया उसे ब्रह्मचारियों जो इन्हीं की वंशानुगत संतान होती थी उन्हें ज्ञान देना ये गुरुवाद था और इसके उपरांत इन सीखने सिखाने के सभी दायित्वों से परे केवल अपनी आत्मा में स्थिर होकर अपने सन्यास यानि अपने आप का विस्तार करने के अर्थ में जीवन जीना ही मोक्ष अर्थ था यही यहाँ भगवन विश्वामित्र के जीवन चरित्र में हुआ की वे क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गए ना की वशिष्ठ ने उन्हें ब्रह्मत्त्व की उपाधि दी थी क्योकि ब्रह्मत्त्व कोई उपाधि नही है वो व्यक्ति का स्वयं का आत्मसाक्षात्कार है जिसे स्वयं की अष्ट विकारो को अष्ट सुकार बनाते हुए इन्हें भी त्यागते हुए स्वयं की आत्मा में प्रतिष्ठित होना होता है इसे कोई अन्य नही दे सकता है तभी तो भगवन विश्वामित्र के शिष्य बुद्ध ने यही तो कहा की प्रत्येक व्यक्ति स्वयं की मुक्ति स्वयं के हाथों में लिए है उसे जानो और प्राप्त करो यही ईसा का है की प्रत्येक व्यक्ति अपना सलीब अपने कन्धों पर ढोना पड़ता है यही है वेदिक और विश्वामित्र का आत्मज्ञान जो गुरु पूर्णिमा के पर्व पर प्रकट है।जो आज लुप्त है जिसे प्रथम क्षत्रिय और ब्रह्मणतत्व को प्राप्त श्री गुरु विश्वामित्र ने प्रत्यक्ष किया था तभी वेदिक काल से ईश्वर का जन्म क्षत्रिय वर्ग में ही क्यों होता आया है क्योकि क्षत्रिय ही धर्म को अपने स्वयं के कर्मों को करते हए समाज को ज्ञान और बल के उपयोग से धार्मिक बनाता है जैसा की श्री राम उसके उपरांत श्री कृष्ण और उसके उपरांत महावीर और उसके उपरांत बुद्ध ने संसार को धर्म का सच्चा स्वरूप केवल मनुष्य स्वयं के आत्म बल से आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त कर सच्चे मोक्ष या निर्वाण या केवल्य या बोध को प्राप्त होकर सम्पूर्ण हो सकता है अन्य कोई उपाय इस संसार में नही है यो अन्य का आश्रय त्यागो और स्वयं को जानो यही अहम ब्रह्मास्मि है और इससे भी उर्ध्व की ब्रह्म ही सत्य है यो ही अहम सत्यास्मि है की आत्मा स्वरूप मैं ही सनातन वेदिक सत्य हूँ।यही आत्म सम्पूर्णत्त्व की प्राप्ति ही पूर्णिमाँ है।
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