Home SATYASMEE DARSHAN गुरु आस्था मिले भाग्य रास्ता

गुरु आस्था मिले भाग्य रास्ता

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90 के दशक की बात है ये भक्त निश्चल शर्मा अपने मित्र रविकांत जिसका मकान और अब कलश होटल बना हुआ कचहरी के पीछे है के साथ मेरे पास आया इन दोनों के विषय में बताने के उपरांत जब इसने अपने भाग्य में आये अवरोधों का उपाय पूछा तो मैं बोला कर लेगा ये बोला हां गुरु जी जो भी आपके मुख से आदेश निकलेगा वही करूँगा तब मेरे मुख से निकला की जा एक सौ आठ हनुमान चालीसा के पाठ कैसे भी नित्य करना तू जो चाहेगा मिलेगा इसने ये सुन कोई अन्य विकल्प की बात नही की कि कैसे करूँगा आदि बस नमन किया तब ये कोई नोकरी ढूढ़ने और कोर्स करने बुलंदशहर से दिल्ली लगभग नित्य बस से जाता था इसने घर पर पूजाघर में सात चालीसा करी और बाकि बिन किसी से बोले ये दिल्ली के रास्ते बस में करता था यहॉ रविवार व छुट्टी में आकर मेरे पास बैठकर अन्य भक्तों अनिल ध्यानी,विपिन् मिश्रा,अजय,मंजीत,संजीव श्रीवास्तव आदि के साथ ध्यान लगता और ध्यान में शरीर कंपित होता हुआ ऊपर की और तन जाता जिसे मुझे स्पर्श से सहज करना पड़ता इसी बीच ये किसी परिचित के ऑफिस गया वहां उसको आये वो नही जा रहा था यो एक ही नोकरी के आवेदन पत्र की प्राप्ति हुयी जो की मुरादाबाद की रूस में जूतों की सप्लाई करने का बड़ा स्तर का कार्य था यो कुछ समय यहाँ रहकर फिर रूस में सर्विस को जाना था तब इसने वो फार्म लिया और भरकर भेज दिया और मेरे पास आकर बताया की गुरु जी मुरादाबाद बात हुयी वे बोले भई तुन्हे ये एक फार्म कैसे मिला और तुम्हारा मुरादाबाद में गारंटर कौन है? तब मैने उसे बुलंदशहर से ट्रांसफर पर मुरादाबाद गए एक भक्त ट्रेजरार द्धिवेदी जी का पता दिया और मेरा परिचय ले मिल लेना ये वहाँ गया और इस व्यक्तिगत गारंटर से बड़ा कौन गारंटर होता यो तुरंत इसे रूस जाने की आज्ञा हो गयी इसने अपने साथ मेरा भी पासपोर्ट बनवा दिया जो आज तक यो ही इसी निश्चल भक्त के द्धारा पुंररूपांतरण होकर रखा है तब ये बाहर गया और वहाँ इसने भ्रष्टाचार देखा की कम्पनी वाले व वर्कर मिलकर जूते के ट्रक को पुराने जूतों और खाली डिब्बों से भरकर लूटपाट आगजनी दिखा हानि बताये और स्वयं उन्हें बेक देते इसको भी उसमे शामिल होने को कहा इसने मुझे फोन कर बताया की ऐसी बात है बहुत् बड़ी पैसों की लेन देन में मुझे अपने साथ जोड़ना चाहते है मैने कहा तुरन्त अपने मालिकों को इस घपले की सुचना दो इसने तुरन्त मुरादाबाद मालिकों को सुचना दे दी वे बिना सुचना के तुरन्त रूस पहुँचे और वे सब लोग पकड़े गए साथ ही इससे प्रसन्न होकर उन्होंने इसे वहाँ का मेनेजर नियुक्त कर दिया ये है गुरु आज्ञा और ईमानदारी का तुरन्त शुभ परिणाम अब ये वहाँ सबसे महंगी गाड़ी में आता जाता था बहुत बड़े पैसे का लेन देन इसके हाथ में था परन्तु इसका भाग्य फिर पलटा वहाँ देश में बटवारें को लेकर अराजकता फैल गयी सब कम्पनी एकाउंट बन कर दिए और अपने देश जाने की आज्ञा हो गयी अब इसका फोन आया की गुरु जी वहाँ से नम्बर दो के तरीके हवाला आदि से मैं बहुत पैसा ला सकता हूँ नही तो केवल खाली हाथ ही वापस आना पड़ेगा मैंने इसे कहा की ये सब नही करो बस जो मिले वही ईमानदारी से लाओ वो ही प्रयाप्त हॉगा तेरे भाग्य में यही लिखा है आगे फिर अच्छा होगा ये वहाँ से आया और जो इसे धन मिला उससे आश्रम को एक कुछ समय चली मारुती कार खरीद यहाँ खड़ी कर दी चूँकि मैं कही नही जाता था वो वर्षो इधर उधर खड़ी रही इसके विवाह के बाद खराब हो यूँ ही किसी को कम पैसे में देनी पड़ी इसने बिन कहे पेरासोनिक का हैंड फोन खुद आकर लगाया ताकि मुझे फोन सुनने को उठकर नही जाना पड़े इस भक्त की कोशिश ये रहती की ये गुरु जी को जाने क्या क्या कर दे यही भक्तिप्रधानता का उच्च गुण है जो प्रत्येक शिष्य में होना चाहिए की बिन कहे गुरु काम करे,यो बिना मांगे मिले वरदान.सदा इष्ट गुरु कृपा रहे मनवांछित हो कल्याण.. एक बार ये अपनी बड़ी बहिन जो बरेली में रहती है उन्हें केंसर का प्रारम्भिक प्रभाव हुआ तब इसने वहाँ पहुँच कर मुझे फोन कर बताया की गुरु जी मेरी बहिन दर्द से परेशान है और मेरी इच्छा है की मैं इनके सिर पर हाथ रख हनुमान चालीसा के अधिक से अधिक पाठ कर दू ताकि उन्हें रोग दर्द से मुक्ति मिले मैं समझ गया की ये चाहता है की इसकी मंत्र शक्ति कितने स्तर पर पहुँची है इसमें उसका परीक्षण करने का विचार है चलो अच्छा है इससे इससे ज्ञान ही होगा मेरी अनुमति पा इसने कुछ दिन में कुछ रात्रि में पाठ किये अब अगले इसका फोन आया गुरु जी मेरे उस हाथ की बीच हथेली में जहाँ दीदी का सिर का स्पर्श किया था वो बड़ा ही जलन करता बडा गर्म हो रहा है मुझे बड़ी बेचैनी हो रही है कही वो रोग मुझे तो नही आ गया क्या उनका पूर्वजन्म या वर्तमान जन्म का पाप कर्म का फल मुझे बदले में नही मिल गया? मैं बोला चिंता मत कर तू वहाँ रखे मेरे फोटो से स्पर्श कर ले ठीक हो जायेगा और इसने तुरंत किया और शांति पायी बाद में आश्रम आकर बोला की गुरु जी आप कैसे इतना सब भक्तों को स्पर्श से पढ़ते हुए झेलते हो? मैं तो जरा से पाठ करने के परिणाम को नही झेल पाया वहाँ भी अपने मुक्ति दिलाई मैं बोला जब दूसरे के व्यक्तित्व की उपासना के स्थान पर स्वयं में स्थित हो जाओगे तो तुम स्वयं ही सकारात्मक शक्ति का स्रोत बन जाते हो तब कुछ नही करना पड़ता है उस समय कर्म यानि क्रिया और और कर्म के फल यानि प्रतिक्रिया के द्धंद या संघर्ष से मुक्त हो जाते हो तब कोई विरोध नही रहता है ये सब रोग गुरुओं में केवक भक्तों के कर्म और फल होते है यो गुरुओं के बाहरी शरीर में दिखाई देते है क्योकि बाहरी शरीर इस कर्मशील द्धंद रत प्रकति से बना है यहां अवश्य प्रभाव होता है परन्तु अंतर शरीर में इनका कोई प्रभाव नही होता है एक बार इसने मेरा बताया स्वर योग किया जिससे इसका आत्मविश्वास इतना बढ़ा की इससे द्रष्टि मिलाना आसान नही रहा था परन्तु अधिक समय तक इसने चन्द्र स्वर को रुई से कुछ घँटों के अंतराल से बदल बदल कर उलटी नाक में अवरुद्ध करके सूर्य स्वर को लगातार चलाने से इसे गर्मी बढ़ गयी भयंकर क्रोध बढ़ा इसने तब मुझसे पूछा की अब ऐसा हो रहा है तब मेने उपाय बताया की कुछ दिनों को प्रातः से साय भोजन करने से पहले तक सीधा स्वर सूर्य को स्वच्छ रुई लगा कर रोकना और इसके बाद किसी भी स्वर में रुई नही लगाना तब स्वयं ठीक हो जायेगा तब इसे लाभ हुआ था। ऐसे ही आगे चलकर फिर यहां दिल्ली में और फिर मेरठ के पास परतापुर की तरफ इसे सर्विस मिली और बुलंदशहर के पास गांव नेथला के प्रतिष्ठित परिवार में अच्छी पत्नी से विवाह हुआ दो बच्चे है ये कभी कभी आश्रम आता रहता है बाद के काल में सिद्धासिद्धमहामंत्र की दीक्षा लेकर उसे जपता हुआ गुरु और हनुमान जी का ध्यान करता है।
ये भी विवाह उपरांत उन्हीं पूर्व भक्तों की श्रेणी में आ गया जो जब अकेले थे कोई साथ नही था तब गुरु साथ लिया और ज्यों ज्यों मनोरथ पुरे हो गए और लगा की मुझमे अब भक्ति से अधिक शक्ति का प्रवाह अधिक है अब गुरु की विशेष आवश्यकता नही पड़ती हमारे संसारी कार्य हमारे इष्ट पूजा से पूर्ण हो रहे है बस यहीं शहर में रहते वर्षो हो जाते है आश्रम और गुरु दर्शन किये हुए यो हटे भी नही और हट भी गए यही निश्चल की अंतिम भक्ति बनी है।इस कथा से ये ज्ञान मिलता है की “गुरु आज्ञा सर्वोपरि,कारज करे सदा स्वयं हरि”गुरु उपेक्षा अवज्ञा करें,शिष्य जीवन अंत न पाये परे”
यो सदा गुरु आदेश का पालन के साथ जप,तप,दान करते रहने से सदा भक्त का कल्याण होता है और स्वार्थ या गुरु में दोष देखने पर भविष्य में बड़े संकट पाता है।

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