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सनातन और जैन धर्म का पुरुष और स्त्री के प्रति नग्नवादी दर्शन में समाजिक द्रष्टि में विरोधात्मकता का सत्यार्थ पर सत्यास्मि मिशन की कविता:

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?सनातन और जैन धर्म का पुरुष और स्त्री के प्रति नग्नवादी दर्शन में समाजिक द्रष्टि में विरोधात्मकता का सत्यार्थ पर सत्यास्मि मिशन की कविता?
तन का भान त्याग कर
पंचतत्व परे नग्न है मन।
कभी नग्न बने कभी ढ़के तन
ये अशील प्रदर्शन तन और मन।।
काम भाव के त्याग से
और मन माया परे जगत।
आत्म तत्व में स्थिर मत
वही तन मन नग्न सद् गत।।
नग्नता नाम जब नग्न हो
तब मानो कामुकता मन भाव।
और नग्नता दिखावा जगत हो
तन रख कामुकता स्वभाव।।
ये धर्म नही ना कर्म है
ना नग्न नाम अभ्यास।
केवल दूजे उपस्थिति
और अपने का है भास।।
नग्नता सनातन परम्परा धर्म
सनकादिक मुनि शुकदेव।
त्याग तपस्या निर्विचारित काम
वही दिगम्बर भेष स्वमेव।।
दिगम्बर संत अक्का बाई
आजीवन रही स्वं नग्न।
वस्त्र स्वयं का शरीर रख
यही निराकार आत्मत्त्व अंग।।
साकार अर्थ में वस्त्र सहित
निराकार शब्द नग्न अर्थ।
आत्मा की अवस्था दोनों
सुकार विकार शोधन यहाँ अर्थ।।
जो मन से ऊपर उठ गया
उसको निज तन का नहीं भास।
आत्मा सर्वव्यापी हो
सर्वत्र स्वयं हूँ जीव जगत तन निवास।।
तब क्या ओढ़े क्या नही
और प्रश्न नही जग कोई।
उत्तर में है शांति
वाणी औरों को ही होई।।
यदि करें आलोचना
की ये स्त्री क्यूँ है नग्न।
तब स्त्री पुरुष और काम भाव
है अंतर मन तन भग्न।।
जो छिप कर देखे कामना
और करें छिप कर वासना पूर्ण।
वही नग्नता विरोध में
करते अपनी वासना पूर्ण।।
यो जो कर रहा करे वो
वही इस परिणाम युक्त और भुक्त।
वही इस नग्नता के आनंद में
वही इसका फल कर्मी संग मुक्त।।
योगी देखे दोष ना
ना करता दोष बखान।
सब त्रिगत के कर्म फल
किसे झूठ कहे सत्य महान।।
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