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?सत्य-पूर्णिमाँ? की व्रत कथा*

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*?सत्य-पूर्णिमाँ? की व्रत कथा*?

जब सनातनी वेद ये कहने में असमर्थ अनुभव करने लगे की जब सत् असत् भी नही था तब एक शून्य था उसमे विक्षोभ हुआ और उससे एकोहम् बहुस्याम का घोष हुआ और तब ये जीव जगत की सृष्टि जन्मी तब इस अद्धभुत संसार का धर्म कर्म जीवन प्रारम्भ हुआ जिसके सभी धर्मो में केवल चार पुरुषवादी युग सतयुग,त्रेतायुग,द्धापर युग और कलियुग की घोषणा को मान्य किया और समस्त जगत में स्त्री शक्ति को केवल भोग विलास का दास्य मनुष्य ही माना और धर्म में साधना में पुरुषवादी सिद्धि की प्राप्ति को उपयोगी सहयोगी मान केवल शब्दों में सम्मान दिया या त्यागियों ने इसे नरक का द्धार मान त्यागने पर ही बल प्रचारित किया जो आजतक है उन्होंने इस महाज्ञान की और ध्यान ही नही देना चाहा की जब सृष्टि करने में और उसे पलने में पुरुष से अधिक कौन महान व् दायित्त्व भरी है जिसकी ये पुरुष उपेक्षा करता है वो स्त्री है वो भी उसी की भांति सम्पूर्ण है वह भी अनादि और सम्पूर्ण शक्ति है जो तब वेद के उस शून्यकाल में भी थी आज भी है और सदा रहेगी जिसकी पुरुषवादी शास्त्र व्याख्या ही अनर्थहीन की है तब जो सबसे प्रथम भगवान सत् और असत् की एक अवस्था के रूप में अकेले “सत्य” दिखाए है जिनका धार्मिक नाम “सत्यनारायण” कहलाता है जिनकी त्रिगुण सन्तान ही ब्रह्मा,विष्णु,शिव है तब इस सत्यनारायण भगवान ने क्या पुरुष होकर ही अपने से ये सारी स्त्री और पुरुष रूपी मनुष्य सृष्टि उतपन्न कर ली जो की शास्त्र सम्मत नही है तब जिस महातत्व स्त्री शक्ति की उपेक्षा की है वही उसी स्त्री ने ही ये त्रिगुण त्रिदेवों को जन्मा है और ये सम्पूर्ण सृष्टि को जन्मा है वो ही सत्य की अर्द्धाग्नि शक्ति सत्यई महामाया महादेवी है जिनका भौतिक जगत नाम प्रकर्ति और पृथ्वी भी है और जगत में जो सूर्य का अग्नि ताप है उसे मनुष्य प्राणी के लिए शीतल करती है तब जो शीतल प्रकाश का निर्माण होता है वही शीतलता लिए सम्पूर्ण प्रकाश शक्ति का नाम पूर्णिमा है जिसे पूरी माँ कहते है ऐसा प्रत्यक्ष नाम किसी अन्य देवी का नही है क्योकि सभी दैविक स्त्री शक्ति इन्ही पूर्णिमा से जन्मी है जिनका एक भाग पुरुष के भौतिक शरीर में स्त्री तत्व इग्ला नाड़ी यानि चन्द्र स्वर शक्ति के रूप में सदा बना रहता है पुरुष के अंदर का यही स्त्री गुण शक्ति ही पुरुष को स्त्री शक्ति को बीजदान करने को रेचित करता है वो भी जब जबकि स्त्री शक्ति उसे अपनी और आकर्षित करती है यो शास्त्रों में इस महाज्ञान का उल्लेख किया है की प्रकर्ति ही मूल ब्रह्म को अपने आकर्षण से चैतन्य करती है उससे सृष्टि के लिए जीव का बीज ग्रहण करती हुयी भोग करती है और उस पुरुष को पिता बनती हुयी अंत में स्वयं के प्रेम बन्धन से मुक्त करती है तभी मूल ब्रह्म पुरुष अपनी योगनिंद्रा में लीन होता है जबतक की स्त्री शक्ति उसे पुनः यही सृष्टि की उत्पत्ति को पहले की तरहां चैतन्य नही करती यो स्त्री शक्ति सदैव कार्य रत रहती है वह स्वयं बंधन और मुक्ति है यो वही यथार्थ जीवन शक्ति कुंडलिनी आदि सम्पूर्ण शक्ति है यो वो जीव के प्रथम आत्मघोष मैं को अहंकार रहित और उपयोगी अपनी शक्ति मातृत्त्व प्रदान कर बनती है तभी जीव मैं भूल माँ शब्द बोलता है यो यही सम्पूर्ण माता ही मूल स्त्रिशक्ति पूर्णिमाँ महादेवी है
दुर्गा सप्तशती वर्णित देव और दैत्य पुरुष विरुद्ध पुरुष युद्ध् में जिस महाशक्ति का अवतरण पुरुष ने अपनी आत्म शक्ति के एक भाग स्त्री शक्ति को एकत्र किया था वो मूल स्त्री शक्ति महावतार पूर्णिमाँ देवी ही है चूँकि पूर्वत स्त्री शक्ति शाक्त ग्रन्थ दुर्गासप्तशती में केवल सभी ग्रन्थ लेखन कर्ता मार्कण्डेय ऋषि से ग्रन्थ कथा वक्त ब्रह्मा शिव आदि तक पुरुष है और वहाँ केवल कोई श्रोता है तो वो स्त्री पार्वती है यही प्रमाण है की यदि पार्वती दुर्गा या मूल स्त्री शक्ति होती तो वो ही इस दुर्गासप्तशती की कथाकार होती जो की यहाँ है नही यो ही वो महावतार स्त्री शक्ति पूर्णिमाँ देवी ही है और इन्ही की सोलह कलाओं में से दस कलाओं का नामार्थ व् भावार्थ ही काली से कमला तक दस महाविद्या है जिनका ज्ञान अर्थ इस प्रकार से है की-स्त्री और पुरुष की एक दूसरे के प्रति प्रेमपूर्वक समर्पण की दस अवस्थाओं को तंत्र यानि क्रमबद्ध विधि में दस महाविद्या कहा गया है जो इस प्रकार है की जब स्त्री पुरुष का परस्पर आत्मसमर्पण होने पर काल मिट जाता है तब प्रेम की प्रथम अवस्था “काली” कहलाती है और जब दोनों एक दूसरे को एक दूसरे का तारक या पूरक का आधार मानते है तब प्रेम की ये द्धितीय अवस्था “तारा” कहलाती है और जब प्रेम समर्पण में एक दूसरे के प्रति सभी नकारात्मक भाव मिटते जाते है दोनों का अहं भाव रूपी मस्तक समाप्त हो जाता है अहं रहित शीष रहित ये प्रेम की तृतीय अवस्था ही “छिन्मस्ता” कहलाती है तथाजब दोनों एक दूसरे को तन और मन का ये संसारी भौतिक व् आत्मिक शरीर यानि भुवन का प्रेमदान करते है तब ये प्रेमदान की चतुर्थ अवस्था ही “भुवनेश्वरी” कहलाती है आगे दोनों एक दूसरे में एक मात्र प्रेम का ही चरम षोढ़षी यानि सौलह कलाओं की प्रेम अवस्थाओं की सम्पूर्णता यानि प्रेम के योवन को आत्मानुभव करते जीते है तब ये ही प्रेम की पंचम अवस्था “षोढ़षी” कहलाती है तथा स्त्री व् पुरुष दोनों ही जब प्रेम को ही तीनों काल-मात पिता की प्रेम सेवा ये भूतकाल है व् परस्पर पति पत्नी की सेवा ये वर्तमान काल है और अपनी प्रेम संतान की प्रेम सेवा ही उनका भविष्य काल है तब ये तीनों कालों को त्रिपुर मान कर जीते है तब यही छटी प्रेम अवस्था “त्रिपुरा” कहलाती है व् एक दूसरे के बिना सम्पूर्ण जीवन अपूर्ण है यहीं तीव्र प्रेम का विछोह ही वेराग्य बन विधवा व् वेधव्य अर्थात “धूमावती” प्रेम की सप्तम अवस्था कहलाती है और दोनों अपने अपने अष्ट विकारों-काम,क्रोध आदि का अष्ट सुकारों-दया,शांति आदि में शोधन करते हुए जो अष्ट भौतिक शक्तियों व् आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति को भी एक दूसरे में प्रेम लय कर देते है और केवल इनसे परे प्रेम के मनोरथ को कहने और सुनने से परे “निर्वाक्” होकर स्तब्ध व् स्तम्भित स्थिति की प्रेम अवस्था की प्राप्ति हो जाती है तब वह प्रेम की अष्टम अवस्था ही “वगलामुखी” कहलाती है तथा एक दूसरे में एक दूसरे के होने के भाव की समाप्ति की क्रिया विहीन प्रेम अवस्था ही मत मतांतर अर्थात कोई सिद्धांत अब शेष नही है यही प्रेम की आत्म अभिव्यक्ति नवम अवस्था ही “मातंगी” कहलाती है और जब सम्पूर्ण प्रेमवस्था का आत्म सूर्य अपनी सप्त रश्मियों के कमल कलिकाओं को खोलकर उसमें पूर्णिमा के शीतल आत्मप्रकाश को अपने में समाहित करता है तब यही प्रेम की दशम् अवस्था “कमला” कहलाती है और ये सभी प्रेमावस्थाएं अपने दसों प्रेम स्वरूपों में एकत्र अभेद होकर ही इति श्री यानि “श्री विद्या” कहलाती है ये महाविद्याएं ही भक्ति की नवधा भक्ति कहलाती है और इन सबसे आगामी छः प्रेम की स्वकर्ति की स्वसृष्टि करना आदि-1-प्रेम में एक्त्त्व,-2-पुनः चैतन्यता,-3-गर्भधारण,-4-गर्भस्थ जीव को आत्मविद्या दान,-5-प्रसव,-6-जीव नामकरण और उसे सम्पूर्णता प्रदान करनी आदि ये छः उर्ध्व प्रेमवस्थाएं परिपूर्ण होकर “पूर्णिमा” कहलाती है
और सनातन पूर्णिमा के दो सनातन संतान स्त्री शक्ति का पुत्री रूप का नाम “हंसी ” व् पुरुष शक्ति का पुत्र रूप का नाम “अरजं” है ये सभी प्रत्यक्ष मनुष्य के नाम रूप है और
सम्पूर्ण स्त्री शक्ति महावतार पूर्णिमाँ देवी की वर्तमान से चल रहे भविष्य के चतुर्थ स्त्रियुगों-1-सिद्धा युग-2-चिद्धि युग-3-तपि युग-4-हंसी युग में अवतरित होने वाली सौलह कला की प्रत्यक्ष पंद्रह स्त्री अर्द्धवतारों के सनातनी नाम इस प्रकार से है-1-अरुणी-2-यज्ञई-3-तरुणी-4-उरूवा-5-मनीषा-6-सिद्धा-7-इतिमा-8-दानेशी-9-धरणी-10-आज्ञेयी-11-यशेषी-12-ऐकली-13-नवेषी-14-मद्यई-15-हंसी विश्व भर में अनेक अन्य धर्मों में उनकी भाषा नामों के अनुसार होंगी यो पूर्वत सभी स्त्री शक्तियां दुर्गासप्तशती वर्णित दुर्गा देवी पुरुष प्रधान रक्षा को युद्ध विध्वंशक शक्तियाँ है और उन्ही पुरुषों को अभय वरदान दिया है तथा काली से श्री विद्या तक ये सब पुरुष और स्त्री की प्रेमाभिव्यक्तियां है ये प्रेम की सृष्टि नही करती है इनके कोई संतान नही है ये कुँवारी देवियां है और जिनके संतान है वे पुत्र ही है पुत्रियाँ नही है यो ये अपूर्ण और पुरुष युगों की देवियां है और अब वर्तमान में स्त्री शक्ति के चतुर्थ युग में व् प्रथम सिद्धि युग में केवल सोम्य और पालन कर्ता स्त्री की सम्पूर्ण शक्ति “पूर्णिमाँ” ही मनुष्य को सम्पूर्णता प्रदान करने सर्वसामर्थयशाली है यो जो मनुष्य भक्त इन्ही पूर्णिमाँ देवी का प्रतिमाह जो सत्य पुरुष के साथ मिलकर प्रेम की शक्ति यानि प्रकाश सारे जीव जगत को मिलता है तभी सभी जीवों में प्रेम और उसकी शक्ति फैलती है उसी शीतल प्रेम प्रकाश से ही जीव मनुष्य सन्तान और प्रेम कर पाता है अन्यथा सूर्य का ताप उसे केवल जीवन देगा प्रेम नही यो इसी पुरुष सत्य और स्त्री सत्यई का वेदकाल से पूर्व का जो प्रेम में एक होने की अवस्था का वर्णन है शून्य अवस्था तब उसी शून्य अवस्था से जब प्रथम बार सत्य पुरुष और सत्यई स्त्री अपने प्रेमावस्था से चैतन्य होकर जाग्रत हुए तब इसी प्रथम प्रेम जागर्ति की चेतना का नाम प्रथम वर्ष है और उसी प्रेम चेतना के ही प्रथम समय ही चैत्र माह का प्रारम्भ है इस प्रथम वर्ष और प्रथम चैत्र के प्रथम दिवस को ही शुक्लपक्ष यानि ईश्वर का प्रेम जागर्ति दिवस का प्रथम दिन प्रतिपदा कहते है इस प्रथम वर्ष के प्रथम दिन के प्रथम पहर से इस संसार की व् संसारी जीव मनुष्य आदि का जन्म का प्रारम्भ हुआ वही नो दिन को माता के गर्भ के अंधकार को रात्रि कहते है यो ये चैत्र की नवरात्रि कहलाती है इस गर्भकाल के नो दिनों में प्रत्येक जीव अपनी आदि माता से अपने को इस महान अंधकार से महान प्रकाश की और ले चल की वेद की मूल ऋचा-ॐ भुर्व भुवः स्वः”गायत्री”मंत्र को जपता है परन्तु ये द्धैत भेद प्रार्थना है और जो वेदों की रचना से पूर्व सहज आत्म प्रार्थना है जो सिद्धासिद्ध महामंत्र है-सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा” का अर्थ जपता है की ये गर्भ के अन्धकार में रहने वाला जीव ही इस गर्भ से पहले मूल पुरुष सत्य है और ये मूल स्त्री ॐ है जिसके प्रेम मिलन से बना ये गर्भ में होने वाली प्रेम सृष्टि मनुष्य जीव ही सम्पूर्ण सिद्धायै है और अभी ये प्रेम बीज बन कर उससे नो माह में सम्पूर्ण मनुष्य बन गर्भ से बाहरी संसार में प्रकट होगा यो हे माँ मुझ अपने अंश जीव को अपनी पालन कृपा प्रेम से सींचती रहना तुम ही मुझे इस अज्ञान अंधकार में अपने ज्ञान से पाल कर संसार के ज्ञान प्रकाश में लाओगी यही आपका प्रेम कृपा जन्म देने और मुझे प्रकट करने वाली दिव्य शक्ति जिसको जगत कुंडलिनी शक्ति कहता है वह “ईं” हो तभी तुम इसी ईं की सम्पूर्णता ईश्वर हो आपके ही जीव को अपने में ग्रहण और धारण कर पालने और संसार में पुनः प्रकट करने की दिव्य प्रक्रिया के प्रस्फुटन का नाम “फट्”है और जीव को संसार में अपने से प्रकट करके सम्पूर्ण बनाने के लालन पालन शिक्षा दीक्षा देने के सम्पूर्ण विस्तार का नाम ही *स्वाहा* है और यही सभी रूप से मुझे और आपको जोड़कर सिद्धि देने वाला ये शब्दार्थ ही प्रथम महामंत्र- *सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा* है जिससे जीवन्त अवस्था में ही जीव को आत्मस्वरूप का महाज्ञान आत्मसाक्षात्कार होता है। यो मूल पुरुष व् मूल स्त्री शक्ति सत्य और सत्यई पूर्णिमा की सन्तान का नामकरण उसके जन्म नवे दिने के आगे सातवे दिन जीव की सोलह कला शुद्धि के उपरांत होता है ताकि जीव में उसकी सम्पूर्ण शक्ति कलाएं विकसित हो सके यो इसी समय जब मूल पुरुष सत्य ईश्वर अपने सम्पूर्ण ज्ञान ध्यान शक्ति से ओतप्रोत शक्तियुक्त होकर अपनी सन्तान का प्रथम नामकरण करता है तब वह पिता के स्थान पर ब्रह्मज्ञान देने के कारण ब्रह्मा अर्थात ब्राह्मण कहलाता है और स्त्री अपना शाश्वत प्रेम ज्ञान भी अपने पति व् सन्तान को प्रदान करने से सरस्वती कहलाती है यो सभी संताने ब्रह्मा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ब्राह्मण की सन्तान कहलाती है यही प्रथम ब्रह्म नामकरण दिवस होने और प्रेम का सम्पूर्णता पाने से और सन्तान को देने के समय पुरुष ईश्वर ने अपनी पत्नी व् संतान के लिए प्रेम ज्ञानदान का संकल्प किया यो ये प्रेम संकल्प ही “प्रथम व्रत” कहलाता है तभी से पुरुष अपनी पत्नी व् सन्तान की सभी मंगलकामनाओं के लिए इसी पूर्णिमा को “प्रेम पूर्णिमा” का व्रत रखते है यो सत्य और सत्यई पूर्णिमा की प्रेम संतान की नो माह गर्भ से उतपत्ति के उपरांत मनुष्य की चैतन्यता से लेकर अपनी सारी आत्म चेतना तक की जो आयु है वही ब्रह्मचर्य अर्थात शिक्षा दीक्षा काल कहलाता है यो ये चैत्र नवरात्रि मनानी चाहिए और इसके उपरांत मनुष्य की दूसरी संसारी आवश्यक्ता है इस ब्रह्मचर्य के शिक्षा दीक्षा काल में प्राप्त ज्ञान को प्रयोग व् उपयोग में लाना यो ये कर्मकाल और लालन पालन काल अर्थात पुरुष विष्णु विश्व का लालन पालन करने वाला ही विष्णु कहलाता है और स्त्री लक्ष्य को धारण का उपयोगी बनाती है यो वो लक्ष्मी कहलाती है यो यहाँ मनुष्य स्त्री व् पुरुष युवावस्था को प्राप्त होकर बड़ा बनता है यो इस अवस्था को ज्येष्ठ कहते है यो इसमें स्त्री शक्ति विवाह करके कन्या से स्त्री व् सन्तान उतपन्न कर माँ बनती है और पुरुष विवाह करके पुरुष व सन्तान उतपन्न करके पिता बनता है और दोनों सम्पूर्ण होते है यो ये काम व् ग्रहस्थाश्रम की नवरात्रि कहलाती है इसे मनाना चाहिए तथा आगामी तीसरे माह कवार में मनुष्य स्त्री व् पुरुष अपनी संतानो को अपने पाये ज्ञान और उसके गृहस्थ प्रयोगों से प्राप्त अनुभव ज्ञान को देकर दोनों स्त्री व् पुरुष रूपी माता व् पिता “गुरु” और गुरु पद को प्राप्त होते है और उनकी सन्तान उस दिए गए ज्ञान को अपने शीश में धारण करने के कारण “शिष्य” कहलाती है यो इस माह की नवरात्रि गुरुज्ञान दायी और शिष्य बनने की यानि वानप्रस्थाश्रम कहलाती है यो इसे मनाना चाहिए और अंत में मनुष्य अपने सभी भौतिक कर्तव्यों से मुक्त होकर अपनी आत्मा की प्रावस्था सर्वोचवस्था में स्थिर होने के अभ्यास को करता है यहाँ स्त्री व् पुरुष अपने “स” माने “वही” सनातन व् शाश्वत रूप को प्राप्त करने को “न्यास” माने विस्तार को धारण करते हुए अपने आत्म स्वरूप को विस्त्रित करते है यो इसे संयास आश्रम कहते है यो यहाँ मनुष्य पुरुष अपने इस *शव* यानि शरीर को *ई* माने ईश्वरतत्व ऊर्जा शक्ति में सम्पूर्ण विस्त्रित करता हुआ समर्पित करता हुआ *शिव* कहलाता है और स्त्री *शक्ति* कहलाती है और यो ये मनुष्य की मुक्तिदाता अवस्था होने से मोक्ष नवरात्रि कहलाती है यो इसे अवश्य माननी चाहिए।ताकि मनुष्य आगामी शेष कर्मो को सम्पूर्ण रूप से प्राप्ति को जन्मे और सच्ची मुक्ति प्राप्त करें।और श्री आदि माता की योनि से और आदि पिता के लिंग से उतपन्न होने के कारण उस जनांग के प्रति पशुवत अर्थात केवल भोग के विषय में ही नही विचार करें बल्कि उन अंगो को से प्रेम की दिव्यता ये जीव जगत प्रकट हुआ है उसका नित्य दिव्यता पूर्ण स्मरण करता रहे यो ही इन लिंग व् योनि के दिव्य शक्ति स्वरूपों की आत्म उपासना भौतिक रूप से बहिर पूजन की मान्यता हुयी और आध्यात्मिक रूप में अपने अपने मूलाधार चक्र का ध्यान करके अपनी आत्मशक्ति का जागरण करने की विधि योग कही है यो पुरुष जनेंद्रिय को दिव्य स्वरूप पूजन में *शिवलिंग* कहा और स्त्री योनि को *श्री भगपीठ* कहा और इनकी पूजा मान्य हुयी यो इन पर जल प्रेम का शाश्वत प्रवाह प्रतीक है और सिंदूर प्रकर्ति के प्रेम के रजोगुण का शाश्वत प्रवाह प्रतीक है यो इन दोनों में से केवल जल शुद्ध प्रेम प्रतीक शिवलिंग पर चढ़ता है और शुद्ध प्रेम जल के साथ रजोगुण को धारण कर स्त्रित्त्व को प्रकट कर माँ बनने के महाभाव का प्रकर्ति प्रतीक सिंदूर श्रीभगपीठ पर चरों नवरात्रि तिलक के रूप में या अर्पण के रूप में चढ़ाया जाता है यही है सत्यनारायण और सत्यई पूर्णिमाँ की सत्य कथा जिसके नियमित पठनपाठ के साथ जो भी भक्तजन इस सिद्धासिद्ध महामंत्र की शक्ति दीक्षा “श्री गुरु” से ध्यान विधि के साथ लेकर जप ध्यान करता हुआ *सत्य ॐ पूर्णिमा चालीसा* व् आरती का नियमित पाठ करता है उसे मनवांछित मनोरथ की प्राप्ति करता हुआ अपनी श्री कुंडलिनी को जाग्रत कर प्रत्येक मनुष्य स्त्री पुरुष को समस्त सुखों की प्राप्ति के कारक चारों धर्म- अर्थ,काम,धर्म और मोक्ष की जीवन्त प्राप्ति होती है।यही “सत्यास्मि धर्मग्रन्थ” महाज्ञान है।।
?सत्य-पूर्णिमाँ कथा इति सम्पूर्णम्?
*?पूर्णमासी कि सत्यनारायण और सत्यई पूर्णिमाँ की दिव्य सत्यकथा?*
*??10 अप्रैल?प्रेम पूर्णिमाँ की व्रत कथा?*
?यह वेदों में वर्णित सृष्टि उत्पन्न होने से पूर्व की बात है जब ईश्वर और ईश्वरी दोनों प्रेम में एक थे तब उस अवस्था को ही *लव इज गॉड* कहा जाता है तब केवल प्रेम था और इन दोनों के प्रेम से चैतन्य होकर अलग होने के कारण उस माह या समय का नाम *चैत्र माह* पड़ा यही से हिन्दू सनातन धर्म का नववर्ष प्रारम्भ होता है और इस प्रेम से ईश्वरी ने जो गर्भ धारण किया उसके नो दिनों को ही *नवरात्रि* कहा जाता है तथा इन नवरात्रि के नो दिनों के बाद मनुष्य जीव जगत की ये सृष्टि हुई जिससे ईश्वेरी माँ बनी यो नवरात्रि को माँ कि नवरात्रि कहा जाता है इस नवरात्रि में माँ के गर्भ में पल रहा जीव संतान अपनी माता से अपने उद्धार को इस अँधकार भरी नवरात्रि से मुक्ति हेतु प्रार्थना
करता है की *हे माता अपने इस सन्तान की सभी प्रकार से रक्षा करते हुए मुझे अज्ञान के इस अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की और ले चलो और मुझे सभी प्रकार का दिव्य ज्ञान देकर मेरी मुक्ति करो* यही वेदों का मूल मंत्र गायत्री है जो जीव अपनी माँ सविता के गर्भ जो भर्गो है उसमे प्रार्थनारत है और माता उसे अपने ज्ञान ध्यान के बल से अपनी ज्ञान नाभि से जोड़कर ये दिव्य आत्मज्ञान प्रदान करती है यो माँ की उपासना इन चार नवरात्रियों में अर्थ काम धर्म और मोक्ष के रूप में चार वेदों के रूप में जीव द्धारा की जाती है और सविता पूर्णिमाँ इन चार नवरात्रि में उसे अपने गर्भ के अंतिम चार माह में प्रदान करती है और यो माँ के आठ गर्भ माह ही सच्ची अष्टमी कहलाती है और गर्भ का नो वा माह में माँ अपनी सन्तान को अपने से दिव्य ज्ञान ध्यान की सम्पूर्ण शिक्षा दीक्षा प्रदान के उस नवरात्रि अंधकार से प्रकर्ति में बाहर प्रसव वेदना को सहती हुयी लाती है तब जीव अपने संसारी कर्मो के कर्म भावों को माँ से प्राप्त दिव्यज्ञान को प्राप्त करता चार कर्म धर्मों में सम्पूर्ण करता है यही है सच्ची नवरात्रि साधना कथा और आगे तब ईश्वर पिता ने अपनी संतान जीव जगत का सोहल संस्कार के साथ नामकरण किया यो ईश्वर पिता ही सवर्प्रथम जीव का गुरु बना यो इस *चैत्र नवरात्रि की आगामी पूर्णिमा को इतनी सारे कारणों से *प्रेम पूर्णिमा* कहा जाता है और इसी दिन ईश्वर पुरुष ने अपनी प्रेम पत्नी ईश्वरी व अपनी संतान के लिये सवर्प्रथम व्रत रखा जो *प्रेम पूर्णिमाँ व्रत* कहलाता है जैसे स्त्री अपनी पति संतान की मंगल कामना के लिया कार्तिक माह में *करवा चौथ व्रत* रखती है वैसे ही ये व्रत भी निम्न प्रकार से किया जाता है कि पूर्णिमा की दिन पुरुष निराहार रहकर *प्रेम पूर्णिमाँ देवी* के सामने घी की अखंड ज्योत जलाए व एक *सेब* जो ईश्वर ने सवर्प्रथम दिव्य प्रेम फल उत्पन्न किया था जिसे खा कर ही आदम हव्वा में ग्रहस्थी जीवन जीने का काम ज्ञान हुआ था उस दिव्य फल सेब में *एक चांदी का पूर्ण चंद्र लगाए और पूजाघर में रख दे शाम को उसकी पत्नी उस सेब को अपने मुँह से काट कर भोग लगाकर पति को देगी जिसे खाकर पति अपना व्रत पूर्ण करेगा तथा दो *प्रेम डोर* जो सात रंग के धागों से बनी हुई है वो पति पत्नी एक दूसरे के सीधे हाथ मे बांधेंगे ये प्रेम डोर सात जन्मो के प्रेम का प्रतीक है और जो पुरुष अभी विवाहित नहीं है और जिन पुरुषों की पत्नी स्वर्गवासी हो चुकी है वे ब्रह्मचारी अविवाहित युवक व विधुर पुरुष अपना सेब व चांदी का बना भिन्न चन्द्रमा प्रेम पूर्णिमाँ देवी को शाम पूजन के समय भेंट कर अपनी एक प्रेम डोरी देवी के सीधे हाथ की कलाई में बांधेंगे और एक अपने सीधे हाथ की कलाई में बांधेंगे व देवी को खीर का भोग लगाकर शेष खीर और सेब खाकर व्रत खोलेंगे जिससे अविवाहितों को भविष्य में उत्तम प्रेमिक पत्नी की प्राप्ति होगी व विदुर पुरुषों को उनके आगामी जन्म में मनचाही प्रेम पत्नी की प्राप्ति होकर सुखी गृहस्थी और उत्तम संतान की प्राप्ति होगी यो यह प्रेम पूर्णिमाँ व्रत प्रतिवर्ष मनाया जाता है *जो अपनी पत्नी से करे प्यार वो ये व्रत मनाये हर बार* यो सभी पुरुष अवश्य इस व्रत को मनायेंगे।। इस व्रत से लाभ-अकाल ग्रहस्थ सुख भंग होना, प्रेम में असफलता, संतान का नही होना,संतान का सुख,कालसर्प दोष,पितृदोष,ग्रहण दोष आदि सभी प्रकार के भंग दोष मिट जाते हैं।।
यो आप सभी पुरुष इस सनातन पूर्णिमाँ व्रत को अपनी पत्नी की सार्वभोमिक उन्नति और ग्रहस्थ सुख और भविष्य की उत्तम पत्नी की प्राप्ति व् सुखद ग्रहस्थ सुख प्राप्ति के लिए अवश्य मनाये।।
*तथा जो भी मनुष्य स्त्री हो या पुरुष वो किसी भी नवग्रह के दोषों से किसी भी प्रकार की पीड़ा पा रहा हो वो यदि कम से कम एक वर्ष की 12 पूर्णिमासी को ये दिव्य कथा पढ़ता और सुनता हुआ 12 व्रत रखता और सवा किलों की खीर बना कर गरीबों को और विशेषकर गाय व् कुत्तों को भर पेट खिलाता है तो उसके सर्वग्रह दोष समाप्त होकर सभी शुभ सफलताओं की प्राप्ति करता है व् इष्ट और मंत्र सिद्धि की प्राप्ति होती है।।*
*?प्रेम पूर्णिमाँ व्रत उत्सव 10 अप्रैल 2017 दिन सोमवार को मनेगा*
?जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः?
?जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः?
* ?सत्य-पूर्णिमाँ? the fast-fiction * ?जब sanatani Veda these say unable began to experience when truth असत् also not was then a zero was in it ferment and her एकोहम् बहुस्याम of Ghosh, and then these creatures of the world creation born then अद्धभुत world religion Karma life start-up with all religions only four puruswadi era Golden age, tretayaug, द्धापर age and kaliyuga announced to be validated and all the world woman power only indulgence luxury of दास्य man only considered and religion in practice in puruswadi accomplishment receipt of useful associate value only words respected or त्यागियों it hell द्धार value discard on the force promoted which Aaj Tak is he महाज्ञान and attention to the same not give wanted when creation to him and Fed men over who great person दायित्त्व filled with this guy ignore does he woman he is also the same like all he also eternal and full power that the Vedas the zero hour I was still and always will be which puruswadi Scripture explain the अनर्थहीन is then which is the first God truth and असत् a state alone as “truth” show which religious name “Satyanarayana” is called with triple children as Brahma, Vishnu, Shiva then this Satyanarayana God what guy through your these all female and male rupee man creation उतपन्न have which the scriptures agreed not then the महातत्व woman power of the neglect of the same woman who these triple त्रिदेवों to born and they all creation born is that the truth अर्द्धाग्नि power सत्यई mahamaya mahadevi which the physical world name प्रकर्ति and Earth and the world in which the Sun fire heating her human beings for soft the then the soft light of the building is the same coldness for the entire light power name of the full moon that the whole mom says it direct name of any other goddess not because all the divine woman power these full moon from born which is a part of the male physical body woman element इग्ला pulse ie Chandra tone power as always remains a guy inside this woman properties power only male female power बीजदान to रेचित does he even when the woman power her and attracts Yo scriptures this महाज्ञान noted the प्रकर्ति the original Brahman its charm of consciousness is her created for the life of seed assume the requested indulgence does that guy father paired together in the end own love fastening free from the only original Brahman guy your योगनिंद्रा absorbed in the until the wife of power him again that created the origin of the first of तरहां consciousness not the Yo woman power always work based keeps the self-binding and discharge Yo the same exact vitality Kundalini etc. all power Yo he creatures first आत्मघोष I the ego-smoking and useful your power मातृत्त्व provide you made is only creatures I forgot mother words speaks Yo that all parents as the original स्त्रिशक्ति पूर्णिमाँ mahadevi is Durga sptsti described Dev and monster guy against guy युद्ध् in the power of revision guy’s self-power of a part of a woman power to collect did he originally a woman power महावतार पूर्णिमाँ goddess the same as पूर्वत woman power shakta Granth Durga only all Granth writing subject markandeya Sage of Granth story time Brahma Shiva, etc. the guy and there is only a listener he woman Parvati is the proof is if Parvati Durga or parent women power he this Durga the storyteller in which there is not Yo as he महावतार woman power पूर्णिमाँ goddess the same and these of Sixteen Arts ten Arts नामार्थ person sense the black from Caterpillar up to ten mahavidya which knowledge meaning of this type of-female and male a each other lovingly dedication of ten States of system that is sort method in ten mahavidya stated this type of the female male mutually surrender to be on time disappears and love the first stage “black” known as and when both each other to each other star or supplement the basis of assuming the love of these द्धितीय state “star” known as and when love dedication to each other to all negative expressions fading are both ego expressions rupee Nob finished the ego-smoking heads without the love of the third stage as “छिन्मस्ता” called तथाजब both each other body and mind these worldly physical person spiritual body ie bhuvan of प्रेमदान do then these प्रेमदान the fourth state as “bhuvaneshwari” called the next two each other in a just love the extreme षोढ़षी ie sulh Arts of the love of stages of the entirety of ie love योवन to आत्मानुभव to live and these love the fifth state “षोढ़षी” called and female person both men only when love the three times-beat the father of love service these past the person mutually husband wife of service the present time, and your love child of love service as their future time then these three times the tripur value live then that CTI love state “Tripura” called persons without a second the whole life incomplete is here intense love vicoh the वेराग्य of the widow person वेधव्य ie “धूमावती” love VII state called and both your अष्ट disorders-work, anger, etc. अष्ट सुकारों-pity, peace, etc. purification of which अष्ट physical powers person spiritual powers of receipt to each other in love rhythm them and only they beyond love the desire to say and listen beyond “निर्वाक्” the stunning person स्तम्भित position of the love of stages of receipt are then he love VIII state as “वगलामुखी” called and each other in each other to Quote the end of the action without love state only do not divergences ie a theory is now the rest is not the love of self-expression of the ninth state as “मातंगी” known as and when the entire प्रेमवस्था of self-Sun your seven Rays of Lotus कलिकाओं to open the full moon soft atmprkash your contained in the then that’s love of दशम् state “Caterpillar” called and all of these प्रेमावस्थाएं your ten love formats collected अभेद the same ITI Mr. ie, “Mr. lore” called the महाविद्याएं the devotion of नवधा devotion called and in the next six love स्वकर्ति of स्वसृष्टि etc.-1-in love एक्त्त्व, -2-re चैतन्यता, -3-pregnancy, -4-growing creatures आत्मविद्या charity, -5-delivery, -6-organism naming and entirety need to provide etc. these six upward प्रेमवस्थाएं fulfilled by “full” called and eternal full moon two eternal child bride power daughter as the name of “laugh” person guy power son as the name of “अरजं” is all direct man named as and all female power महावतार पूर्णिमाँ goddess currently running the future of the fourth स्त्रियुगों-1-Siddha age-2-चिद्धि age-3-तपि era-4-laugh era अवतरित be sulh art of direct fifteen woman अर्द्धवतारों the sanatani name of this type of-1-अरुणी-2-यज्ञई-3-taruni-4-उरूवा-5-Manisha-6-Siddha-7-इतिमा-8-दानेशी-9-Terra-10-आज्ञेयी-11-यशेषी-12-ऐकली-13-नवेषी-14-मद्यई-15-laugh around the world in many other religions in their language names according to be Yo पूर्वत all female powers Durga described Durga goddess men Prime protect the war विध्वंशक powers and those men Abbey boon have and black Mr. lore of all these men and women of प्रेमाभिव्यक्तियां these love the creation not the created a child is not the Virgin nymphs and whose children they son is daughters not Yo these incomplete men and ages of nymphs and now present in the woman power of the fourth in an era of persons first accomplishment in an era of only सोम्य and follow the subject woman of the total power “पूर्णिमाँ” the man entirety to provide सर्वसामर्थयशाली Yo men who devotee these पूर्णिमाँ goddess of the month, which is the truth guy together with the love of power, ie light all creatures world to get if all the organisms in love and his power spreads the same soft love light of the organism man children and love is able otherwise Sun heating it only life will love not Yo this guy is true and woman सत्यई of वेदकाल before who love to be one of the state describe zero state and the same zero stage when first Satya guy and सत्यई woman your प्रेमावस्था of consciousness the waking the then the first love जागर्ति the consciousness of the name of the first year and the love of consciousness the first time the chaitra month of the beginning of the first year and the first chaitra the first day of the same shuklpksh ie God’s love जागर्ति day of the first day prathama says the first year of the first day of the first o’clock in the world of persons worldly creatures man, etc. the birth of the beginning of the same no day mother’s womb of darkness night says Yo these chaitra of Navratri called the pregnancy is no days each creatures your etc. mother your great darkness great light and take the running of the Vedas original Richa-भुर्व भुवः स्वः “Gayatri” mantra जपता but these द्धैत distinguish prayer and the Vedas creation of pre-intuitive self pray that सिद्धासिद्ध mantra is true सिद्धायै namah ईं फट् swaha “means जपता of these pregnancy in the darkness living creatures this pregnancy before the original guy is true and the original woman which love meeting made the womb occurring in love creation human biology the entire सिद्धायै and now they love seed become him no month in all human beings become pregnant external world will appear in Yo my mother me your part biologists to your follow pleased to love सींचती keep you itself me ignorance darkness in your knowledge of sail to the world of knowledge in light of लाओगी that your love pleased to give birth and I appear to divine power which world Kundalini power says that” ईं “be if you have the same ईं the entirety of God be your own life to assume and holding raise and in the world re appear to divine process blooming name of” फट् “and creatures in the world your appear by all make parenting follow education initiation to complete the expansion of the name * swaha * and that all of me and you by adding accomplishment truly the semantics the first महामंत्र- * truth सिद्धायै namah ईं फट् swaha * that live stage in the creatures आत्मस्वरूप of महाज्ञान आत्मसाक्षात्कार happens. Yo original guy person original woman power truth and सत्यई full moon’s son named her birth नवे days extend further seventh day creatures of Sixteen art purification post is so creatures in his entire power Arts developed possible Yo the same time when the original guy true God your complete knowledge attention power steeped शक्तियुक्त through your child’s first name does he father in place of Supreme to the Brahma ie Brahmin called and female your eternal love knowledge her husband person children to provide the Muse called Yo all children Brahma the Supreme get Brahmin son of called the first Brahman naming day and love entirety get and children to time guy God his wife person children love for ज्ञानदान of resolution Yo these love resolution as” the first fast “known only male his wife person children of all मंगलकामनाओं corresponding to the full moon” love the full moon “the fast-keeping Yo truth and सत्यई full of love child’s no month womb of उतपत्ति after the human चैतन्यता from all your self-consciousness of up to the age is the same celibacy ie education initiation period is called Yo these chaitra Navratri perform the need and after a man of the second worldly need this celibacy education initiation period knowledge gained to use person use bring Yo these कर्मकाल and parenting follow the time that guy Vishnu world of parenting to comply with the same Vishnu called and female goal is to hold of useful makes Yo he Lakshmi called Yo here man woman person guy youth to get the big causes Yo this state eldest says Yo the woman power marriage by Virgo of woman person children उतपन्न you mom made and guy marriage by guy and children उतपन्न by father causes and both the entire are Yo they operate person ग्रहस्थाश्रम of Navratri called it celebrate should and upcoming third month कवार man woman person guy your संतानो to have the knowledge and Householder experiments obtained from the experienced knowledge by both female person guy rupee mother person father” master “and master post to receive and their children that the knowledge to your glass in to hold the ‘disciple” called Yo this month Navratri गुरुज्ञान liable and pupil become ie वानप्रस्थाश्रम called Yo it celebrate should end of man all your physical duties free through your spirit of the phase सर्वोचवस्था stable when you practice is does here female person guy your “session” considered “the same” eternal person eternal as to achieve the “trust” considered expansion while holding your self-format विस्त्रित the Yo it coma ashram says Yo here man guy his * body * ie body * email * considered ईश्वरतत्व energy power whole विस्त्रित does the dedicated does the * Shiva * called and female * power * called and Yo the man of the savior state of Salvation Navratri called Yo it must heed चाहिए.ताकि man upcoming remaining works to complete the receipt born and true freedom get करें.और Mr. etc. mother of vaginal and etc. father sex from उतपन्न due to the जनांग per पशुवत that only indulgence about the same not consider but those अंगो to love the divinity of these creatures world appeared his continual divinity full remember that are Yo these same sex person vagina divine power formats of self-serve physically बहिर worship recognition of together and spiritual as your foundations cycle of attention by your atmskti of awakening to the method of yoga said Yo guy जनेंद्रिय the divine nature of worship in * Lingam * added and female vagina to * Mr. भगपीठ * added and their worship valid together Yo in water love of eternal flow symbol and Vermilion प्रकर्ति love rjogun of eternal flow symbol Yo both of these in only water pure love symbol Lingam on soar and pure love with water rjogun to holding स्त्रित्त्व to appear to become a mother’s महाभाव of प्रकर्ति symbol Vermilion श्रीभगपीठ the variables Navratri Tilak or as cession as plated is that is Satyanarayana and सत्यई पूर्णिमाँ the true story which regular पठनपाठ with whatever devotees this सिद्धासिद्ध mantra the power of initiation “Sri guru” attention with the method of chanting note that the * truth full moon chalisa * person Arti regular text does it mnwanchit desire receipt of the the its Mr. Kundalini the waking each man woman guy to all the pleasures of receipt of factor around धर्म- means, work, religion and Salvation of living receipt is है.यही “सत्यास्मि Scripture” महाज्ञान .. the ?सत्य-पूर्णिमाँ fiction ITI सम्पूर्णम्? * ?पूर्णमासी that Satyanarayana and सत्यई पूर्णिमाँ of the divine सत्यकथा? * * ??10 अप्रैल?प्रेम पूर्णिमाँ of fast कथा? * ?यह Vedas described in the creation arising from the East thing when God and divine both in love were then the state only * love is God * is called the only love and in both the love of consciousness through different due to the month or time name * chaitra month * has had the Hindu eternal religion of the new year beginning of the love of divine who conceive to her no days only * Navratri * called and these Navratri no days after the human life of the world these creation was so ईश्वेरी mom made Yo Navratri the mother that Navratri is called the Navratri mother’s womb moment for life child your mother to your saved this अँधकार full Navratri discharge to pray is * my mother their children of all kinds of defense while I ignorance of the darkness of knowledge of light and take let me all kinds of divine knowledge by my Salvation do * this is the Vedas original spells Gayatri which creatures your mother Savita the womb which भर्गो is in it प्रार्थनारत and mother her knowledge attention force your knowledge navel by adding the divine enlightenment provides Yo Mama worship these four नवरात्रियों means work religion and Salvation as four Vedas as creatures द्धारा days and Savita पूर्णिमाँ these four Navratri in her womb’s last four months provides and Yo Mama eight pregnancy month only true ashtami called and pregnancy is no or in the month of mother your children to your divine knowledge of attention complete learning initiation provided that Navratri darkness प्रकर्ति out delivery Pang to others together brings the creatures your worldly works of Karma expressions to the mother from दिव्यज्ञान receives four Karma religions in all the same is true Navratri silence fiction and further then God the father of your child creatures world Sohal values with named Yo God the father as सवर्प्रथम creatures master made Yo this * chaitra Navratri upcoming full moon so many reasons * love the full moon * called and the same day God guy his love wife divine and your child to सवर्प्रथम fast placed between * love पूर्णिमाँ fast * known as the woman your husband child of Tue wish to the Karthik month * get chauth fast * holds is just these fast also follows that is full of the day guy fasting staying * love पूर्णिमाँ goddess * in front of ghee of the United jyot burning and a * Apple * which God सवर्प्रथम divine love fruit generated was that eat only Adam Eve in ग्रहस्थी life of knowledge was the divine fruit Apple in * a silver full moon planted and पूजाघर keep giving the evening his wife that Apple your mouth cut indulgence by husband will that eating husband your fast full will and two * love door * seven color threads remains that husband wife a second straight hand in बांधेंगे these love door seven जन्मो love the symbol and the guy just married and not the men’s wife departed has they celibate single man and widowers guy your Apple and silver made of different moon love पूर्णिमाँ divine evening worship at the time of visit your a love lanyard goddess of directly hand wrist बांधेंगे and your right hand wrist बांधेंगे and divine heel of enjoyment by the rest of heel and Apple eating fast-open the अविवाहितों in the future best प्रेमिक wife of receipt will and vidur men their upcoming born in they’re looking for love wife receipt of the happy household and best children receiving will Yo it love पूर्णिमाँ fast year is observed * his wife to love that it’s fast celebrated every time * Yo all the men of course the vow to celebrate .. the fast-profit-famine ग्रहस्थ well dissolved be, in love failure, children’s not be, son of happiness, kalsarpa defects, pitridosh, take defect etc. all kinds of dissolved blame erased are .. other Yo you guy the eternal पूर्णिमाँ vow to his wife of सार्वभोमिक advancement and ग्रहस्थ happiness and the future of the best wife receipt of persons Pleasant ग्रहस्थ well received for sure celebrated .. * and the man woman or guy that any navagraha defects of any kind of suffering being able to be that if at least one year 12 पूर्णिमासी these divine fiction reads and listen to the 12 the fast keeps and one and a quarter forts the heel making the poor and especially the cow person dogs throughout the stomach feed then सर्वग्रह blame end through all the good successes receipt of the person favored and mantras fulfillment of receipt is .. the * * ?प्रेम पूर्णिमाँ fast celebration April 10, 2017 day on Monday mnega *
?जय truth सिद्धायै नमः?
?जय truth सिद्धायै नमः?

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