Home Satyasmee Mission मेरी हनुमान उपासना,दर्शन और सिद्धि

मेरी हनुमान उपासना,दर्शन और सिद्धि

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ये सन् 80 के दशक के अंत की बात है की मेरे मामा के बेटे भोपाल भैया वे राजनैतिक क्षेत्र और यूनियन लीडर थे वे किसी अपने काम से जयपुर गए वहाँ हम उनसे छोटे भाई नेपाल भैया जो बचपन से हमारे पास ही रहे है वे बिड़ला बिट्स स्कुल में फिजिक्स के अध्यापक थे उनसे मिलना भी था तब वे मुझे भी अपने साथ ले गए यो हम वहां रात्रि को पहुँचे वे और नेपाल भाई अपने किसी काम को चले गए मैं और उनका ड्राइवर कमरे पर थे तब वो ड्राइवर बाहर पीना खाना खा कर वापस आया और अपनी कथा मुझे सुनाने लगा की मैं एक प्रसिद्ध पीर के आशीर्वाद से पैदा हुया और मैं ब्राह्मण हूँ और आगे उनकी चलकर उनकी गद्दी पर भी बैठूंगा अभी उन्होंने मुझे घूमने और भजन करने को कहा है आपके भाई से मुझे बहुत प्यार है आदि आदि बाते बोलता रहा तब मैं उसे धार्मिक जानकर उससे बोला की भई पँडतजी मुझे कुछ पूजा पाठ की बताओ मैं तो केवल ध्यान जप ही करता हूँ मुझे विशेष विधि कोई नही पता है यो बताओ वो बोले की किसकी सिद्धि करनी है काली माँ या शिव जी की मैं बोला मुझे हनुमान जी से ज्यादा प्रेम है उन्हीं की साधना बताओ इस घटना के बाद फिर कभी इनसे मुलाकात नही हुयी तब उसने कहा लिख लो मैं विधि बताता हूँ की ये इकतालीस दिनों की प्रातः करने की साधना है इसमें तुम पहले दो फूल वाली लौंग के जोड़े के हिसाब से एक डिब्बी में लौंग इकट्ठी कर लेना ताकि साधना नही टूटे और एक डिब्बी अलग खाली रख लेना जिसमें ज्योत पर लौंग की भेंट चढ़ाकर उसे उसमे रखते जाना और अंत में इन सब लोंगों को बहते पानी में डाल आना यो नित्य दो लौंग ली उस पर जरा सा दूध कैसा भी हो लगा लेना और फिर थोडा सा मीठा गुड या चीनी के दाने दूध की बूंद से चपक जायेंगे अब सामने ज्योत जलाकर उसकी जलती लौ में लौंग को जरा सा निम्न मंत्र ग्यारह बार बोल कर फिर जलाना और इस लौंग को खाली डिब्बी में रखते जाना साथ ही पूर्व दिशा की और मुख कर बैठना अब केवल सात बार हनुमान चालीसा पढ़ना और इष्ट को नमन कर पूजा समाप्त बाकि करते जाओगे हनुमान जी की कृपा होगी मैं उन दिनों खेती कराता यो गांव आना जाना लगा रहता पर चूँकि ये लगभग फ़रवरी की बात है यो तभी खेतों में पानी लगा था यो इतना निर्विध्न समय मिला मैंने कभी ज्योत आदि नही जलायी थी बस जप ध्यान ही करता करता था और मेरी माता जी भी प्रातः साय केवल घी की ज्योत पूजाघर में जला देती बाकि कोई अनुष्ठान आदि कभी हमारे घर नही हुया यो इस विषय में कोई जानकारी नही थी तब मैने अपने प्लाट में रहने वाले बिहारियों के यहाँ से मट्टी के तेल की छोटे साइज़ की ढिबरी मंगायी की वही मेरी ज्योत जलाने के काम आएगी जितनी देर जलानी है उतनी देर जलाओ और बाद में उसे कहाँ जलती छोड़ू यो पूजा के बाद तुरन्त उसे बंद कर दूंगा यो उसकी कांच की चिमनी हटा उन्हें वापस कर दी चिमनी रखने के काँटों पर मेने एक हनुमान जी का स्टील का बना छोटा सा लॉकेट धागे में बांध कर लटका दिया और एक चवन्नी भी दक्षिणा में रख दी ये सब मैने अपने पढ़ने की बड़ी मेज पर एक साइड में रख दिया की यहीं आकर पूजा करूँगा अब प्रातः कसरत करता और स्नान करता हुआ सामान्य वस्त्रों नेकर बलियान में आता और दो लौंग घर में रखे दूध के बर्तन में डुबोता और एक डिब्बे में रखी चीनी में उसे लगाता उस पर चीनी के कुछ कण चिपक जाते और मेज पर आकर उस मट्टी के तेल की ढिबरी को जलाता और उसकी जलती ज्योत में उस लौंग के अग्र भाग के फूल को थोडा जलता हुआ उपरोक्त बताया मंत्र- ॐ भगवते नारायण मनसा देवी अपने भक्त की कर मनसा पूरी…को ग्यारह बार जपता और लौंग को खाली डिब्बी में बन्द कर देता तब सामने पूर्व की और मुख कर कुर्सी पर बैठ कर उस पर पालथी ठीक से नही लगती थी यो चारों और से घुटनों को घेरता हुआ दोनों हाथ जोड़ता हुआ बैठ जाता ओर एक बार जलती ज्योत को देख कर फिर स्टील के सफेद रंग के हनुमान जी को देखता और आँखे बंद करके तेजी से सात बार हनुमान चालीसा पढ़ता जाता था उस समय मन की आँखों से हनुमान जी के अंग अंग में ज्योति को घुमाता हुआ चालीसा पढ़ता था मुझे केवल हनुमान चालीसा ही आती थी उनकी आरती नही आती यो केवल चालीसा करता पूरी होने पर आँखे खोल कर नमन करता की हनुमान जी महाराज मैं इससे ज्यादा कुछ नही जानता हूँ मेरी गलतियों को छमा करना और यदि दर्शन दो तो ठीक नही तो हाथ पैर नही तोडना की जब तुझे पूजा करनी नही आती तो क्यों कर रहा है? और बस ढिबरी की ज्योत को उसकी बंद करने की चक्री से घुमा बंद कर देता और उस ढिबरी को एक साइड कोने में रख देता मेरी पूजा समाप्त बाकि दिन कोई चालीसा नही जपता बस रात्रि को ध्यान ही करता था मुझे एक श्लोक दुर्गा सप्तसती का मेरे बिजली से पकड़ने और बारूद से जलने की घटना के उपरांत मेरे छोटे भाई सजंय के मित्र ने ये कह दिया था की भैया इसे ..सर्व बांधा… को जपते रहा करो मैं उसे ही जपता था मेरे छोटे भई अंजय को भी ये मन्त्र जपने से इतना सिद्ध हो गया था जिसकी कथा फिर कहूँगा तब इकतालीस दिन हो गए मुझे कोई दर्शन स्फुरण आदि नही हुए तब मेने विचार किया की अरे जब तक चलती है करता रहूंगा छूटेगी तब छूटे बस पैंतालिसवा दिन था प्रातः मैं कसरत कम कर स्नान कर पूजा समाप्त करके अंघेरा होने पर आलस्य में अपने तख्त पर सीधा लटके चिंतन में आँखे बंद कर लेटा हुआ था की मुझे अचानक वही स्टील के आकर के हनुमान जी के अंग अंग में जलती ज्योति का स्पष्ट चित्रण दिखा और कुछ समझता तभी अचानक मुझे हनुमान जी का केवल चेहरा स्पष्ट दर्शन हुआ उनकी भयंकर आलोकित सुनहरे तेज से प्रज्वलित आँखे मुझे देखती है बिलकुल मेरे कुछ ही दूर पर दर्शन हुआ इतने मैं कुछ समझता चैतन्य होता इतने ये दर्शन गायब मैं इस दर्शन से बड़ा ही चोंक गया और उठ बैठा कि ये क्या? ये ही दर्शन है? पर इसे किससे बताऊ कोई गुरु तो था नही बस इसी पर विचार करता दिन निकल आया अपने गांव को चला गया इसके बाद कोई दर्शन नही हुए और गांव के काम के कारण ये दैनिक पूजा भी टूट गयी बस स्नान कर चालीसा पढ़ लिया करता था अब एक दिन मेरे मुस्लिम मित्र जहीरुद्दीन भाई ने कहा की महाराज तुम पूजा पाठ ध्यान करते हो अपनी पूजा में देखना की हमारे घर में बड़ी अशांति है आदि आदि मैं बोला कोशिश करूँगा तब उस रात्रि को मैं सात बार चालीसा पढ़ इस बात पर विचार कर सोया तो मुझे मध्य रात्रि में स्पष्ट दिखा की उनके ऊपर के मकान में झीनें से चढ़ती एक मुस्लिम सफेद सिलवार सूट पहने भारी शरीर की महिला खाने की प्लेटों में कुछ पढ़ती हुयी फूँक मारती इनकी भाभी को दे रही है और सब उन प्लेटों में खाना खा रहे है और एक असर में आकर आपस में लड़ रहे है ये बात मैने एक आद दिन बात शाम को हम इस आश्रम वाले घर की और लौटते में उन्हें बताई वे बोले महाराज ये तो हमारी भाभी की भाभी है जो अपरकोट पे रहती है और वो बड़ी जादू टोन वाली ओरत है उसके एक अलग कमरे में एक चर्बी का दीपक अखण्ड जलता रहता है सुनते है की एक बार वो इबादत कर रही थी थोड़ी सी दूर पास में उसका छोटा सा बच्चा सो रहा था तो वो गलत पढ़ गयी यो आसमान से अंगारे उसके बच्चे के ऊपर गिरे वो चिल्लाया पर वो उठी नही फिर से सही से पढ़ंत की और सब ठीक किया ये सुना बोले की महाराज कुछ् करो सब ठीक हो मैं ये सुन कुछ डरा सा हुआ तब मैं उन्हें कचहरी के चोराहे पर छोड़कर लोट रहा था अँधेरा था ये भय की अनुभूति हुयी की भई मेने तो ऐसे कोई चमत्कार नही देखे अब ऐसा ना हो की तुम्हारी टाँग ही उलटी हो जाये तभी मुझे अंदर लगा जैसे कोई हंसा और बोला की बस डर गए अरे मेरे रहते किसी से डरने की आवश्यकता नही पता नही कौन था? अंदर हनुमान जी या मेरी आत्मा थी? बस मेरा डर समाप्त मेने रात को सोते हुए ही सात बार चालीसा पढ़ी और सो गया कुछ नही दिखा अब बात आई गयी हो गयी तब एक दिन जहीर भाई की दुकान पर स्कूटर ठीक कराने गया तब वे बोले महाराज तुमने ऐसा क्या किया की अगले दिन ही भाभी की भाभी भागी हुयी आई मेरी बहिन ने सुना था की बोली की अब मैं तेरे लिए नही करूंगी मेरा तो चिराग ही बुझते बुझते रह गया किसी ने तुम्हारी तरफ से बड़ा जादू किया है और चली गयी तब से घर में शांति है मैं ये सुन अचंभित रह गया की ये क्या हुआ और मेरा साहस बढ़ने लगा यहाँ से मेरी और इससे भी अद्धभुत दर्शनों को कथाएँ प्रारम्भ होती है जिन्हें समय समय पर कहूँगा..बाद के वर्षो में मेरे पूर्वत अनेक भक्त जो आज प्रतिष्ठित हनुमान जी की गद्दी और अन्य देवी देव के पीठाधीश्वर बन अपना स्वतंत्र दरबार लगा चला रहे है उन्हें इस उपरोक्त बताई उस विधि से करते हुए उन्हें अपनी योग्यतानुसार दर्शन लाभ कुछ सिद्धि हुयी औरों को भी अनेको लाभ हुए अब ये मेरे किसी कार्य की नही है क्योकि आत्मसाक्षात्कार होने पर ये सब समझ आता है ये सब मेरी ही पूर्व जन्म सिद्धियां थी जो आगामी वर्तमान जन्म में यहीं तक रही ये देवी देवताओं आदि की अन्य सभी सिद्धियां आगे चलकर सिद्धासिद्ध महामंत्र की नींव बनी यो वतर्मान भक्तों के ज्ञान को ये दी है जिन्हें गुरु मंत्र और दीक्षा है उन्हेँ गुरु मंत्र के विधिवत जप से सर्वसिद्धियाँ समयानुसार उपलब्ध होंगी।
और आगे चलकर यही विधि मैने स्वत अन्तः प्रेरणा से अपने सिद्धासिद्ध महामंत्र सत्य ॐ सिद्धायै नमः मन्त्र को जपते हुए लोंगो से भक्तों को करायी उन्हें लाभ हुआ बस यहाँ देवी मंत्र के स्थान पर ॐ श्री गुरुवायै नमः अपने भक्त की कर मनसा पूरी..के ग्यारह बार जप करते ज्योत पर बाकि सारी पूर्व लिखी विधि से करने को बताई भक्तों को लाभ और अनुभव हुए जिन्हें देख ये पता चला की ये सब गुरु कथन आज्ञा में श्रद्धा रख करने का ही प्रताप है जैसा गुरु कहे वैसा करने से शिष्य का अवश्य कल्याण होता है।
यहाँ ज्ञान ये है की भक्ति सरलता और ईश्वर आश्रित रहकर सहज भाव से बिना फल की इच्छा किये जो भी जैसा भी कर्म यानि पूजापाठ करोगे वही फलेगा लाभ अवश्य देगा
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