Home SATYASMEE DARSHAN आत्मदर्शन और स्वरूप योग रहस्य प्राप्ति

आत्मदर्शन और स्वरूप योग रहस्य प्राप्ति

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सच में योग इतना अनसुलझा नही है जितना बना दिया गया है यथार्थ योगियों ने कुछ लिखा नही जिन्होंने लिखा वे योगी नही जबकि योग और कुण्डलिनी जागरण योग बहुत सरल है पर उसे समझना होगा की प्रत्येक मनुष्य में ऋण और धन(-,+,0) और बीज का त्रिगुण योग है यही त्रिपुण्ड है जैसे पुरुष में मूलाधार चक्र में ऋण शक्ति और उसकी त्रिगुण अभिव्यक्ति होती है यही चार दल कमल खिलना अर्थ है अर्थात पुरुष में ऋण शक्ति की मात्रा ज्यादा होती है और उसकी धन यानि स्त्री शक्ति उसके सहस्त्रार चक्र में होती है वहाँ ऋण शक्ति कम होती है धन शक्ति अधिक होती है और इन दोनों का एकीकरण करने का नाम ही योग या भक्ति कहलाता है यही स्वास् प्रस्वास् क्रिया है इस आती जाती सांस को देखने की प्रक्रिया योग रहस्य का अर्थ भी यही है की पुरुष में अंदर आती स्वास् ऋण शक्ति यानि पुरुष शक्ति है जो मूलाधार चक्र से आकर्षण है और जाती प्रस्वास् स्त्री शक्ति धन है जो सहस्त्रार की और का आकर्षण है यो ये दोनों आकर्षण ही एक दूसरे के विपरीत आकर्षण बनकर विकर्षण कहलाते है जबकि एक ही तत्व है यही व्रत चक्र है की अंत में एक आकर्षण दूसरी और का जो पहले के लिए विकर्षण है वो घूमकर आकर्षण ही रूप में परस्पर मिलेगा यदि ऐसा नही हो तो सदैव द्धैत ही बना रहेगा एक्त्त्व नही होगा इसे ध्यान से समझना तब समझ आएगा और ठीक ऐसे ही स्त्री में धन शक्ति मूलाधार चक्र में त्रिगुण बनकर चतुर्थ दल रूप में है यहाँ पुरुष शक्ति कम है और स्त्री के सहत्रार चक्र में पुरुष शक्ति अधिक और स्त्री शक्ति कम होती है ये कम शक्ति ही रिफ्लेक्शन यानि विकर्षण या प्रतिक्रिया बनाती है और जब इन दोनों साँस और प्रसास पर केवल ध्यान देते है तब इन दोनों में बड़ा तीर्व आकर्षण विकर्षण होने लगता है यही मन्थन यानि भस्त्रा यानि साधक में साँस का बिना प्रयास के तेज चलना होना है और पेट अंदर बाहर होता है जिससे ऊर्जा का उत्थान होता है जिसे नही झेलने पर साधक चिलाता है उसे समझ नही आता ये क्या हो रहा है वो उससे पीछा छुड़ाता है तब उसकी अचानक हुयी एकाग्रता भंग हो जाती है और ये भस्त्रिका समाप्त ये भावावेश समाप्त हो जाता है जिसे लोग भुत प्रेत का आना मानते है तन्त्र माने सिस्टेमेटिक यानि तन्मात्रों का करम्बन्ध ज्ञान ही तांत्रिक कहलाता है नाकि ये अज्ञानी जिनसे ऐसे साधक या मनुष्य का सत्यानाश हो जाता है उसका भावावेश विक्षिप्त हो जाता है जो आसानी से ठीक नही होता कोई योगी ही अपनी ऊर्जा के सही शक्तिपात से उसे सन्तुलित करता है अब आगे की तब ऐसे केवल अपनी उपस्थिति का ही ध्यान करने से व्यक्ति अपने अंदर और बाहर के ऋण और धन के संघर्ष को देखते देखते इन दोनों के उर्जात्मक संघर्ष से उत्पन्न एनर्जी फिल्ड चुम्बकीय क्षेत्र से घिर जाता है जिसका नाम है शक्ति दर्शन और इन दोनों के एक दूसरे से चार बार अनुलोम विलोम यानि आकर्षण विकर्षण मिलन व् विछोह से बने स्थानों को भी देखता है जिनका योग नाम चक्र है यो कुण्डलिनी को वक्री यानि सर्पाकार कहा है जबकि शरीर में ये क्रिया और प्रतिक्रिया के मिलन विछोह ही अपने गुणन से दो से 4+8+12+16 और सहत्र दल रूप में चक्रों में घूमती शक्ति भिन्न भिन्न चक्रों के रूप में घूमते अनुभूत होते है और आज्ञा चक्र में दोनों शक्ति विलय होती है और बीज बनने की प्रक्रिया से गुजरती है यो वहाँ दो दलों के बीच एक बिंदु है तब यहीं से बिंदु यानि ऋण और धन का मिलन ही सहस्त्रार चक्र में अपना प्रथम स्वरूप केवल उर्जात्मक यानि घनघोर प्रकाश के रूप में दर्शन देता है और दूसरे रूप में स्त्री और पुरुष के युगल यानि जोड़े के रूप में दिखाई देता है जिसे अपने अपने धर्म और पन्थ में राधा कृष्ण या सीता राम या शिव शक्ति आदि नाम से जानते है और अंत में तीसरा स्वरूप है स्वयं का जिसमें जो पुरुष है उसे अपन रूप और स्त्री है उसे अपना वर्तमान रूप का प्रकाशित दर्शन होता है और सम्पूर्णता में सर्वत्र केवल मैं ही हूँ यहाँ जो दर्शन होते है वो अलिंग के होते है केवल मैं ही हूँ अर्थात जो भी दृष्टिगोचर है वो सभी रूप मेरे है यो द्रष्टा को अपने स्वरूप के एक साथ ही सर्वत्र सूक्ष्म और स्थूल सभी रूप और प्रकाश के दर्शन होते है यो मुझे अंत में यही हुआ तब मैं जाना की ये तो मैं सदा से था और हूँ और रहूंगा।
ये सब चिंतन स्पष्टता लिए इस और अनेक आत्मयोगदर्शनों के अनुभूत होने पर पूर्णतया और शाश्वत ज्ञान बने जब मुझे इस महादर्शन का आत्मानुभव हुआ की एक बार मैं ऐसे ही अपने सामने के फर्श की और खुली द्रष्टि से चिंतन करता हुआ बहिर जगत भाव से परे अंतर जगत भाव में चला गया यहाँ ये समझने की बात है की खुली आँख से भी ध्यान होता है इसे शाम्भवी मुद्रा कहते है जेसे किसी ने आपसे आपके घर परिवार के विषय में प्रश्न किया तो तत्काल आपको अपनी खुली आँख से अपना घर या चिंतन किया व्यक्ति या पदार्थ स्मरण होकर अस्पष्ट सा दिखने लगेगा और जो दिख रहा है उसके साथ जो वर्तमान काल जो की उससे मिलने और बिछुड़ने के उपरांत भूतकाल समय हो चूका वही स्मरण आएगा उसीको स्मरण करते आप अपना अनुभव वार्ता करेंगे की ठीक है या नही है ठीक इसी अवस्था के प्रारम्भ को योग में संयम करना कहते है अर्थात धारणा का विषय यानि जिसे जानना है उस व्यक्ति या पदार्थ को स्मरण करना और दूसरा उसे पूर्ण स्पष्ट देखना ये ध्यान है और तीसरा है फिर उसके साथ जो आपका पूर्व संस्कार है उसे स्मरण करते हुए उसी कर्म का आगामी फल परिणाम को जानने हेतु उस पल का इंतजार करना ये तीनों मिलकर संयम कला कहते है जिसे मेने वर्षो के अनुभव से जाना है जो मेने तुम्हे यूँ ही बताई है ओर मुझे अनेक योगग्रन्थों को पढ़ने समझने पर नही मिली यही गुरु ज्ञान है जो सिद्ध गुरु प्राप्ति पर सहज होता है तब इसी संयम कला से योगी जिस भी विषय में ध्यान करते है उस विषय को अनुभत कर लेते है यो मेने अपने पूर्व योग जीवन को विचार करने प्रारम्भ किया और साथ ही योगियों को स्मरण किया क्योकि मेरा कोई गुरु तो था न है जबकि तुम्हारा है यो मेने स्मरण किया और विचार चलते रहे किसी के आने पर ध्यान टुटा तब मैं उससे बात करने के उपरांत लेट कर आँखे बन्द कर पुनः व्ही विचार करने लगा और योग तन्द्रा में चला गया तब देखा की यहाँ मैं कुछ दूर से द्रष्टा हूँ और एक हल्के से अंधकार में एक चोकोर खाना है उसके मध्य में एक गोल पर खाली बिंदु है उस केंद्र बिंदु से चारों कोनों की और चार पत्तियां निकली है इससे ऊपर मैं उठाकर देख रहा हूँ की एक हरित रंग की पृथ्वी पर हरे रंग की साडी पहने सावँल रंग की भारतीय सी लगने वाली अर्द्धलेटी अवस्था में इधर उधर देखती हुयी स्त्री है उसके आधार पृथ्वी के पीछे से हरित आभा का अद्धभुत प्रकाश समस्त में व्याप्त है और ऊपर उठता हूँ तब देखता हूँ की एक हल्के गुलाबी रंग की अद्धभुत आभायुक्त पृथ्वी मण्डल है जिसके सम्पूर्ण हिस्से को घेरती हुयी एक बदरपुर यानि गुलाबी रंग की साड़ी पहने गौर वर्ण और गुलाबी सी आभा वाली एक मध्यायु की स्त्री है जो थोडा तिरछी होकर अर्द्धलेटी अवस्था में अपनी कोहनियों का सहारा लेकर चारों और देखती हुयी अवलोकन कर रही है मुझे लगा की जैसे मैं इसे जानता हूँ मेने उसे पहचानने के लिए कुछ पास गया उसे आभास नही हुआ पर गोलांडकार चहरे सौम्यता लिए बड़े नेत्रीं आनंद मुस्कान से चिंतन में ज्ञात और अज्ञात के परे देख रही है ऐसा अनुभव हुआ अब मैं और ऊपर की और देखता हूँ तब पाया की वहाँ एक गोलचंद्राकार है जो अनन्त विस्तृत भी है उससे श्वेत दूधियां रंग की रश्मियां नीचे की और बरस रही है मैं उसमें से ऊपर को ये देखने का प्रयास कर रहा हूँ की ये प्रकाश कहाँ से आ रहा है पर स्रोत का पता नही चला और लगा की मेरी आँखे खराब नही हो जाये पर उसका शीतल प्रकाश में आँखे सहज और शांति पा रही है अब उसी के केंद्र में देखने के द्रष्टा भाव के रहते मैं पाता हूँ की मैं उसे भेद कर ऊपर एक अनन्त अद्रश्य आधार पर खड़ा हूँ और अपने होने के आभास के पाते ही मेरे अनेक रूप बदल रहे है कभी कोई पूर्व हुए प्रसिद्ध अवतरित मनुष्य रूप धरता और तुरन्त रूप रूपांतरित होकर एक नवीन पर परिचित स्वयम्भू अवतरित गुरु रहे है उनको अपने में स्पष्ट देखता हुआ चारों और सीधे हाथ को अभय मुद्रा में आशीर्वाद देता हुआ देखता हूँ की चारों और अनन्तता व्याप्त है कोई जीवित प्राणी नही है बस एक प्रकाशित व्योम है और तभी लगा जेसे मैं अपने में ही समाहित हो गया हूँ और उसी के साथ मुझे इधर शरीर में चैतन्यता होती गयी और मेरी आँखे खुल गयी तब इस दर्शन का अनेक बार चिंतन करने पर पाया की नीचे देखा चौकोर खाने में बिंदु मूल बीज है और उसकी चार पत्तियां मनुष्य बीज का चतुर्थ कर्म और धर्म-अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष या चार वेद है यही मूलाधार चक्र है जो तम् प्रकर्ति से प्रकाशित है यो गहरे लाल रक्त वर्ण जो क़ाला रंग प्रतीत होता है उससे प्रकाशित है यही पाताल है इससे ऊपर हरित रंग ये समस्त जीवंत वृक्ष पेड़ पौधों की जननी और व्यवस्थापक प्रकर्ति नारी है और इससे ऊपर रजोगुणी यानि सौंदर्य प्रदान करने वाली और क्रियाशीलता देने वाली प्रकर्ति है इन्ही को शास्त्रों में लक्ष्मी,गोरा आदि धर्म नाम दिए है और इनके अंत में जो शीतल चन्द्र रश्मीयुक्त अनन्त प्रकाशित प्रभामण्डल है यही पूर्णिमाँ है जो निराकार और साकार दोनों है पर अरूप और चैतन्य है इसी के दर्शन को योगी देखते खो जाते है जो इसे पार करते है वही अपने अनन्त जन्मों के अनन्त नामधारी सम्पूर्णता पाये व्यक्तित्वों को सरूप देखते है और पाते है की सर्वत्र एक मैं ही हूँ मुझसे भिन्न कुछ भी नही है मैं स्वयं कल्याणकारी होने से स्वयं को ही प्रकट करता वरदाता हूँ यो यहाँ आकर योगी कहते है की मैं अपनी प्रकर्ति को वशीभूत करके आजन्मा और सरूप हूँ मेरे कालांतर में अनेक नाम है पर मैं अनामी ही हूँ मैं स्वयंभू हूँ और अंत में मैं स्वयं ही में समाहित होकर वर्तमान बना रहता हूँ यही वर्तमान जीवन और उसकी जीवन्तता कहलाती है तब अपने वर्तमान स्वरूप में चैतन्य होता है तब कोई समाधि नही होती वेसे भी समाधि स्वयं में झांकना ही है अब झांकने और जानने को कुछ शेष नही है तब ये अवस्था भी समाप्त होती है सदा को चैतन्य था,हूँ और रहूंगा इसी महाभाव में जीता है यही अहम् सत्यास्मि दर्शन है।तब के अनेक वर्षों उपरांत ये महामन्त्र और सत्यास्मि दर्शन अवतरित हुआ।
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